Sunday, August 30, 2009



मेरी इन आँखों में उल्फत की नमी रह गई,
सब कुछ पास है मेरे बस तेरी कमी रह गई।

बाम-ए-दिल
बनाया था तेरी हसरतों को,
दिल के कूचे में मगर याद शबनमी रह गई।

कुरेद कुरेद के इश्क को निकाला था मैंने,
खूँ में ज़ालिम की कुछ बूंदे जमी रह गई।

इश्क़ की तलब में सफ़र मीलों का फ़ना करके,
तेरी महफिल में मेरी चाल कुछ थमी रह गई।

यूँ ही अब मेरे गुलशन तक ये भी नहीं आती,
बहारें भी आज कल परस्त-ओ-मौसमी रह गई।

ज़ीस्त में अब बचा कुछ ना सिवा वीरानी के,
'आदि' के हाथ में तेरी कुछ यादें रेशमी रह गई।



[बाम - छत]

3 comments:

  1. bahut achchh.e bhai ...bahut achchhe

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  2. wow aditya..
    image achhi lagai hai, bahut badhia..

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  3. subhan alla.....kya likha hai adi..pic is also marvellous...
    sach mein jis gehrayi se tum likhte ho its indescribable..
    alwys keep smiling sona..payal

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