Monday, September 21, 2009

चले कहाँ तुम महफिल से ...

हुस्न क़यामत सा लेके ये, चले कहाँ तुम महफिल से,
कुछ देर खुदाया रुक जाओ, अरमान हुए हैं गाफिल से।

देखा है क्या तुमने किसी को, दुआ मौत की करते हुए,
खन्जर देके हाथ में उनके, करते हैं गुजारिश कातिल से।

अपनी कचहरी चौखट तेरी, जुल्फें तेरी अपनी सज़ा,
हमको शिकायत कोई नहीं, मिलें भला क्यूँ आदिल से।

कोई तो सहारा दे दो ज़रा, कोई तो घर तक पहुँचा दो,
जबसे नज़र में आये हैं वो, बन बैठे हम बिस्मिल से।

अब हाल मरीजों वाला है, ना कोई दवा ना दुआ लगे,
क्यूँ ऐसे हाल में छोड़ गए हैं, पूछे कोई उस संगदिल से।

कैसे मनाऊं अब मैं खुदा को, कैसे दुनिया को समझाऊं,
रीत-रिवाज ये तालीमों के, क्यूँ पूछते हो मुझ जाहिल से।

गर साथ यूँ ही तुम चलते रहो, सफ़र ख़तम ना होने दूँ,
हम-राह रहोगे सनम मेरे, क्या करना मुझको मंजिल से।

डर क्या होगा मौजों का और, तूफानों से खतरा क्या,
'
आदि' की कश्ती ही लगी है, तेरी बाहों के साहिल से

Friday, September 11, 2009

सवाल ...

दौर--खिज़ा हैं गुलशन में जाना कैसा,
इन टूटे ख्वाबों से रातों को सताना कैसा।

ज़िन्दगी तो यूँ तन्हा भी गुज़र जायेगी,
फिर इसे समझाना कैसा बहलाना कैसा।

मेरे आते ही जो मुंह फेर लिया है उसने,
उसकी साँसों पे फिर हक जताना कैसा।

उसकी फुरक़त में बेचैन हुआ है दिल ये,
खाम्खा झूठी ख़ुशी का फिर बहाना कैसा।

तोड़ के नाते सभी गैर की महफिल में है,
प्यार से रिश्ता फिर झूठा निभाना कैसा।

तुम कभी इश्क करो और तन्हा हो जाओ,
वो जब भुलाये तुम्हें लगता है बताना कैसा।

ग़म ये सारे मुझे हम-सफ़र से लगते हैं,
फिर 'आदि'...रोना कैसा मुस्कुराना कैसा।

Monday, September 7, 2009

इक रोज़ चले हम ...


अरमानों को सहेज कर इक रोज़ हम चले,
ख़त में इश्क भेज कर इक रोज़ हम चले.

उनका मकान दूर था कुछ अपनी गली से,
फिर चाल अपनी तेज़ कर इक रोज़ हम चले.

यारो उनकी दीद की हमें जो आरजू रही,
उस मर्ज़ से परहेज़ कर इक रोज़ हम चले.

शय भी थी इक मात भी कुछ सूझा नहीं हमें,
उस इश्क से गुरेज़ कर इक रोज़ हम चले.

उम्र अपनी फ़ना करके ये दिल था रो रहा,
रगों को फिर नौ-खेज़ कर इक रोज़ हम चले.

भागते ना 'आदि' यूँ जो जीत सकते हम,
ज़ीस्त सजदा-रेज़ कर इक रोज़ हम चले.



[Gurez - Avoiding]
[Nau-khez - Youthful]
[Sajda ' rez - Bowed]

Saturday, September 5, 2009

सलाम लिए जा ...

गम-ए-फुरक़त का यार इक सलाम लिए जा,
फहरिस्त-ए-दीवानों में एक और नाम लिए जा।

लुट गई आज फिर से जो तेरे नाम के साथ,
मेरी महफिल की फिर से इक शाम लिए जा।

गम-ए-दौराँ से किस बात पे तू डर रहा है दिल,
उनकी इबादत में उनका बस अब नाम लिए जा।

मिल जाएँ राह में तो उनसे कह देना बशर,
यहाँ कोई मर गया है उनपे ये पैगाम लिए जा।

बिना तेरे मुझे कैसे हो सुकून इस सेज पर,
आ तू मेरी कबर से सभी आराम लिए जा।

इश्क तुझसे करके जो हुई थी खता कभी,
मुस्कुरा के तू अपने भी इन्तक़ाम लिए जा।

बसर 'आदि' का मुनासिब है नहीं इस शहर में,
अब ख़ुश हूँ वीराने में ये सब इंतज़ाम लिए जा।