Friday, August 21, 2009

तेरे बिना ...


तेरे बिना वक्त के हर करम नागवार गुज़रे,
सूखे सूखे से फिर ये मौसम--बहार गुज़रे।

मेरी रूह को उल्फत ने सज़ा कुछ यूँ दी है,
तेरी यादों में मेरे सब ख्वाब बेज़ार गुज़रे।

जब तक अनजान था कुछ गुमाँ खुशी का था,
तड़प उठा मैं जब तेरे लबों से इन्कार गुज़रे।

दौलत--इश्क बस दिल की बदौलत है मगर,
ज़माने से मिलके नज़रों से सौ बाज़ार गुज़रे।

तुझसे मिलने की तमन्ना में जिया मैं अब तक,
तेरी इक ना के बाद मौत से सौ इज़हार गुज़रे।

नहीं खींच पाता 'आदि' को कोई अपनी तरफ़,
हसीँ चेहरे यूँ तो इन नज़रों से कई बार गुज़रे।

3 comments:

  1. nice ...very nice...
    first sher to behad katil hai...

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  2. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल ..बेहतरीन अशआर

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  3. Aditya bhai,

    Good one..
    is gazal ka matla, to mujhe bahut hi pasand aaya...

    4th sher, utna effective nahi laga..
    daulat-e-ishq bas dil ki badaulat hai magar...

    Keep writing....
    aaj kal vaqt ki bahut mara mari hai, is liye tym nahi de pata hu..

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