Wednesday, February 1, 2012

शायद ...

दिवानों में, शुमार हूँ शायद,
जिंदा हूँ पर, बीम़ार हूँ शायद.

तुझको नशा, पसन्द नहीं,
और मैं इक, खुमार हूँ शायद.

मस्जिद की इक, अजाँ है तू,
मैं वीरानों की, पुकार हूँ शायद.

क्यूँ खुद पे, इख्तियार नहीं,
मैं इश्क का, शिकार हूँ शायद.

महका हुआ, इक चमन है तू,
मैं गम का, बाज़ार हूँ शायद.

बज़्म को बांधती, ग़ज़ल है तू,
मोहताज मैं, अशार हूँ शायद.

मुक़म्मल सी, इक वफ़ा है तू,
टूटा हुआ मैं, ऐतबार हूँ शायद.

बहलाने आते हो, दिल 'आदि',
मैं खिलोनों का, दयार हूँ शायद.



[ Khumaar - Intoxication ]
[ Azaan - Call For Prayer ]
[ Ashaar - Couplet (Plural of Sher) ]
[ Dayaar - Residence ]

Friday, December 23, 2011

तुम.. हर दम मेरे साथ...


सीली
सीली सी इस रात को,
अपनी गर्मी से खुश्क करती यादें..
जिनमें हमेशा से,
सिर्फ तुम ही तो रही हो.

ये यादें.. जो कभी कुरेदने पे आती हैं,
तो दर्द इस हद तक जाता है,
कि आहें भी थक हार कर,
रात के सन्नाटे को गले लगा लेती हैं.

और मुझे छोड़ जाती हैं,
उन लम्हों के आगोश में,
जिनके पास नश्तर से सवाल हैं,
जो ज़हन में यूँ पैवस्त होते हैं,
जैसे माला की डोर में फूल.

उसी माला के कुछ फूल..
अब तक संभाल कर रखे हैं मैंने,
रुमाल, जिसपे तुमने कढाई की थी,
और वो डायरी भी तो याद होगी तुम्हें,
जिसपे कभी तुम अपना,

और..

कभी मेरा नाम लिख दिया करती थी.
उन्हीं शब्दों से होकर,
आज भी एक रास्ता मुझे,
छोड़ आता है एक दरवाज़े तक,
जहाँ से गुज़रा हुआ कल,
बाहें पसारे,
मुझे फिर बुलाता है.

फिर याद आती है वो गलियां,
जहाँ से तुम गुज़रा करती थी,
फिर याद आते हैं वो ठिकाने,
जहाँ से मैं तुम्हें निहारा करता था.

दिन गुज़रे.. लम्हें बरसों में बदल गए,
आज तुम हो.. और ही मैं अब मैं रहा.
पर.. जारी है वो सिलसिला,
जो हस सांस के साथ मुझ में रवाँ है.

कुछ यादें... टपकती रहती हैं,
बारिश में गीली छतों की तरह,
कुछ यादें... महकती रहती हैं,
बाग़ में आई बहार की तरह.

और उनके साथ तुम..
हर दम मेरे साथ..
एक एहसास बनकर,
आज भी रहती हो.. और हमेशा रहोगी.


--- आदित्य.

Wednesday, November 9, 2011

मुझे बदनाम करे...


जो खुले ज़ुल्फ़ तेरी तो, सहर को शाम करे,

तेरी साँसों से ही गुल, ख़ुश्बू का इंतज़ाम करे.

बाद मुद्दत के हैं आई, ये, वस्ल की घड़ियाँ,
वक़्त से कह दो, खुद को, ज़रा ख़िराम करे.

तोहमतें इश्क की सारी, हैं अब कबूल हमें,
फैसला चाहे जो अब, हुस्न का निज़ाम करे.

हुई हैं रुस्वाइयां भी, अब मेरे जीने की वजह,
है यही आरज़ू ये दुनिया, मुझे बदनाम करे.

सारे मंज़र मुझे, कुदरत के, लगते हैं फ़ीके,
तेरे ही ख्वाब देखे, बस, नज़र ये काम करे.

शब-ए-ख़ामोश से, करता हूँ, तेरी ही बातें,
औ' तेरा ही ज़िक्र, दर'लम्हा, ये अय्याम करे.

नज़र वो जाम सी है 'आदि', खता तेरी नहीं,
कि, जिसे देख ले, बस चैन को नीलाम करे.

[ Sahar : Morning]
[ Wasl : Meeting ] [ Khiraam : Slow Pace ]
[Nizaam : Administrator ]
[ Manzar : Scenes ]
[ Shab-e-Khamosh : Silent Night ] [ Ayyam : Day ]


Friday, August 26, 2011

साजिश किया करे...

नाराज़, हुस्न हो तो क्या, काविश किया करे,
क़यामत है दिल खुद अगर, साजिश किया करे.

यारो हिसाब रखते हैं, उल्फत का नादाँ लोग,
बिस्मिल ही क्या जो ऐसी, पैमाइश किया करे.

है ये, अहवाल अगर जीने का, उनसे जुदाइयाँ,
तो दिल, दुआ में मौत की, ख्वाहिश किया करे.

हाथों में सबके, आज कल, पुर-ज़ोर है नमक,
ज़ख्मों की अदम, न कभी, नुमाइश किया करे.

उस आसमाँ का निगहबाँ, बस परवरदिगार है,
जिस आसमाँ में, चाँद ख़ुद, गर्दिश किया करे.

नश्तर है नज़र जिसकी, जुल्फें हैं इक कफस,
सिफारिश, रहम की कैसे, ताबिश किया करे.

सुर्खी-ए-दिल दिल से जाना, संवारो हुस्न को,
लगा गुल'ए'वफ़ा ज़ुल्फ़ में आराइश किया करे.

जो अश्क ही सुलगाएं, आग, सीने में 'आदि',
आतिश की खता क्या, क्या बारिश किया करे.



[ Kavish - Thought ]
[ Paimaaish - Measuring ]
[ Nigahbaan - Guard ][ Gardish - Bad times ]
[ Kafas - Cage/Prison] [ Tabish - Grief/Sorrow]
[ Aaraish - Decoration/ Beauty ]
[ Aaatish - Fire ]