Friday, July 31, 2009


मेरे सीने से मेरे, ज़ख्म ना चुराओ ऐसे,
अभी सोया हूँ, अभी तो ना सताओ ऐसे।

कभी तो मेरे वजूद पे भी, नज़र आएगी,
रौशनी रहने दो कब्र पे, ना बुझाओ ऐसे।

लाख अरमानों का, मंज़र सजा रक्खा है,
ना दूर जाओ मुझे, अब ना रुलाओ ऐसे।

मेरी हस्ती को, तेरी आस का सहारा है,
मानिन्द-ए-वक़्त, तुम तो ना जाओ ऐसे।

जान भी दे दूं गर, इसमें ही रज़ा है तेरी,
वो अदा तो दिखे, साँसों पे हक़ जताओ ऐसे।

मैं नहीं तूफाँ जो, वीरानियाँ दे जाऊंगा,
मेरी राहों को, अज़ल तो ना दिखाओ ऐसे।

अब कहाँ आब है, रंगत है चमक है मुझ में,
मैं तो वीराना हूँ, मुझको ना सजाओ ऐसे।


[अज़ल = म्रत्यु / मौत]

Sunday, July 26, 2009

बड़े अरमान से ये कमरा, संवारा है मैंने,
दिल जिसे कहते हैं, उल्फत में निखारा है मैंने

मेरे होश में आने का ना, इंतज़ार करना यारो,
जाम--मोहब्बत को, सीने में उतारा है मैंने

उम्मीद है कि उनका भी, जवाब आएगा,
बड़ी शिद्दत से मेरी जान, पुकारा है मैंने

हजारों दाग दिल में थे, हजारों ऐब भी देखे,
बड़ी मुश्किल से अब, दिल को सुधारा है मैंने

नज़र में आशियाँ तेरा, रगों में तू रवाँ है बस,
तुझ बिन जी ना पाएंगे, किया इशारा है मैंने

तुम्हारे बिन नहीं है कुछ ,कि ये बस जानता हूँ मैं,
कि जुदा होके इस वक़्त को, बस गुज़ारा है मैंने

मुझे बस जुस्तजू तेरी, सहारा भी एक तेरा है,
कि बाकी चाहतों को, सीने में ही मारा है मैंने

Saturday, July 25, 2009

बिस्तर की सिलवटों ने ...

बिस्तर की सिलवटों ने, ये पैगाम लिख दिया,
ता-शब चली जद्दोजहद, इश्क नाम लिख दिया.

तब होश भी जाता रहा और, चैन भी आता रहा,
जब यार ने मेरे लबों पे, अपना नाम लिख दिया.

दिल ये तड़पा बहुत था और, जागे थे अरमाँ सभी,
जब उसने हसरतों को, सर-ए-शाम लिख दिया.

हमने पूछा कुछ पता तो, दे दो दर-ए-सुकून का,
उसने अपनी जुल्फों का, साया तमाम लिख दिया.

जब खुदा से पूछा मैंने, क्या है अब किस्मत मेरी,
उसने भी उनकी मोहब्बत, सर अंजाम लिख दिया.

होश की बेहोशी पर ना, आया उनको कुछ रहम,
बस यू तड़पना ही मेरा, अय्याम लिख दिया.

जीना भी सीखा हूँ मैं बस, जबसे पाया है उन्हें,
दिल ने उनके फज़ल का, एहतराम लिख दिया.
बस एक खनक की चाहत में, मैं खुद को साज़ बना बैठा,
खुद ही ना जिसको समझा मैं, खुद को वो राज़ बना बैठा.

ज़मीन पे गिरके तड़पा भी पर, हासिल कुछ ना हाथ लगा,
जिसने पर मेरे छीन लिए, मैं वो परवाज़ बना बैठा.

लोग तो मुझसे कहते थे पर, जाहिल मैं ही था शायद,
जो खुद ही अपने कातिल को, अपना सरताज बना बैठा.

क्या मुझे इल्म था हस्ती मेरी, मेरे अपने लूटेंगे,
राज़ कहाँ अब राज़ रहे जो, उनको हमराज़ बना बैठा.

कौन सुनेगा मेरी अब और, कौन करेगा मुझ पे यकीन,
जिसकी खातिर था जुर्म किया, उसको आवाज़ बना बैठा.

क्यूँ चुभन सी होती है मुझको, खुद अपने ही अरमानो में,
जो था कांटो से भरा हुआ, मैं उसको ताज बना बैठा.

मौत ही मंजिल जिसकी है और, चलना भी जिसपे ज़रूरी है,
मैं खुद ही अपने हाथो से, वो राहें आज बना बैठा.
देख तिजारत चाहत की, सांस थमी है यारी की.
कैसे समझाऊ तुझको, क्या हालत है दिलदारी की.

आज बाज़ार-ए-इश्क लगा है, कितने खरीदार आये हैं,
ऐसे आलम में अब दिल में, जगह कहाँ खुद्दारी की.

जब तक मेरे पास था वो, हर शय पे मेरा राज रहा,
अब मुफलिस सा पर भटक रहा हूँ, संगत है बेकारी की.

ना चैन से जीने देती है, ना जान ही मेरी लेती है,
तू ही बता दे मुझको बशर, क्या अदा है ये बीमारी की.

उनके नशे में आलम अपना, खुद ही बेगाना कर बैठा,
अब डरता हूँ अपनों से भी, और चाहत नहीं खुमारी की.

नज़र परेशाँ धड़कन हैराँ, लहू रगों का तड़पा है,
दौड़ता हूँ सायों के पीछे, ये हालत है बेजारी की.

गर सोने दे मुझको वो तो, ज़मीन के नीचे सो जाऊं,
कि अब ना साँसे कटती हैं, बेहया सी इस इंतज़ारी की.