Monday, August 24, 2009

वक्त है संग्राम का ...

अब निशाँ ढूढेंगे मिलके दुश्मन-ए-गुमनाम का,
सरफरोशों को बुला लो वक्त है संग्राम का।

शान पे ऊँगली उठी है अब भला क्या सोचना,
कुर्बानियां देनी ही हैं तो डर नहीं अंजाम का।

देखो कितने ही दिए अब जल उठे इस राह में,
देखो कैसा है हुनर परवानों के पैगाम का।

हमको ही लड़ना है और जीत हासिल चाहिए,
गैरों से अब न लुटेगी है ये फ़ैसला आवाम का।

अब शहीदों की चिताएं न रोयेंगी लाचारी पे,
ढूँढ लेंगे अब पता हम ज़फर के मुकाम का।

दिल को अपने थाम जाँ को ले हथेली पे ज़रा,
दुश्मनी हमसे जो की फिर न रहेगा काम का।

आँसुओ का बदला तेरे खून से लेंगे उदु,
है अगर दम आ ज़रा हो फ़ैसला हर शाम का।

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