Tuesday, August 11, 2009

सफर ...


बड़ी रुस्वाइयां लेकर, चला था उस शहर से मैं,
खुदा ही जानता है ये, बचा कैसे कहर से मैं

अँधेरा इश्क ने करके, उजाडा है चमन मेरा,
भला अब नूर की ख्वाहिश, करू कैसे मेहर से मैं

बड़ी चाहत थी दुनिया को, जनाज़ा देख ले मेरा,
बड़ी ही सख्त जाँ निकला, मरा जो ज़हर से मैं

जहाँ तन्हाइयों का घर, मोहब्बत की तिजारत है,
मजारें हैं जहाँ दिल की, हूँ गुज़रा उस शहर से मैं

बड़ी मुश्किल में कश्ती थी, शबाबों पे थी वो मौजे,
था रूठा नाखुदा फिर भी, बचा कैसे लहर से मैं

सनम तेरी ही तरह सब, छुपाके बैठा है वो भी,
भला गौहर बता कैसे, चुरा लूँ इस बहर से मैं

मेरे हाथो में जो भी था, मेरी किस्मत ने है लूटा,
फकीरों की है ये बस्ती, क्या मांगू इस दहर से मैं




[मेहर- सूरज]
[गौहर - मोती/रत्न]
[बहर- सागर/समुद्र]
[दहर- दुनिया]

3 comments:

  1. अदित्य जी,बहुत बेहतरीन गज़ल है.....गज़ल का हर शेर बहुत बढिया है....आखिर वाला तो ऐसा लगता है हमारी ही बात कर रहा है....

    मेरे हाथो में जो भी था,मेरी किस्मत ने है लूटा,
    फकीरों की है ये बस्ती,क्या मांगू इस दहर से मैं।

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  2. scope of improvement is there :)
    Easy language or more intense shers can be there. :)

    Last sher is good !!

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