Friday, August 14, 2009

वजह ...


हर घड़ी लता हूँ मैं, साथ लेके प्यार को,
तन्हा तन्हा कैसे काटूँ, ज़िन्दगी दुश्वार को

कभी करके मिन्नतें, कभी करके बंदगी,
धीरे धीरे बढ़ा रहा हूँ, इश्क के व्यापार को

जब कभी वो आयेंगे, अपना कर लेंगे मुझे,
आस दिल में ये लिए,
रखता हूँ इंतज़ार को

क़त्ल भी हो जाऊं मैं, जो इक इशारा वो करें,
इस बहाने देख लूँगा, उनकी नज़र की धार को

चाँद कहते हैं उन्हें सब, मरने वाले हुस्न पे,
सब तड़पते हैं गली में, उनके इक दीदार को

नाम उनका लेते लेते, हो रहा है ये फ़ना,
और कोई रट नहीं, मेरे दिल--बीमार को।

नज़र तो कह ही गई है, जो है मंज़र इश्क का,
लब तलक आने में लगता है, वक्त हर इकरार को।

आईने से दुश्मनी, अपनी भी है इक उम्र से,
हमसे पहले हर सुबह वो, घूरता था यार को

3 comments:

  1. Wow Aditya,

    This was what I was looking from you..

    Well done !!
    This is up to my expectations :)

    Mazaa aaya padh kar...

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  2. आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ-
    रचना गौड़ ‘भारती’

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  3. Aapki likhi ye wajah khoob hai...padhakar achchha lga...kaffi dino se thoda vyast hoo ..isiliye aapki rachnaye nahin padhi ,,,par aaj thoda waqt hai,,,padhkar achchha laga...

    badhai ho ...

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