Tuesday, October 27, 2009

कलेजा चीर गया ...

कलेजा चीर गया, बस इक नज़र करके,
होश छीन ले गया, मय सा असर करके।

आरजू भी उसकी, शिकवा भी है उसी से,
कहाँ खो गया है वो, मेरा ये हशर करके।

किसी काम का न रहेगा, ये मकाँ-ए-दिल,
छोड़ नशेमन न जा, कुछ दिन बसर करके।

तब से ही अब्र से, तोड़ दिया नाता हमने,
जब से तू गुज़रा है, काँधे पे चुनर करके।

मेरा होना गर तुझे, खल रहा है बज़्म में,
तो चलता हूँ तेरे हवाले, जाँ-जिगर करके।

क्यूँ इस कदर हावी है, बस तमन्ना तेरी,
रो रहा हूँ खुद को मैं, आशुफ्ता-सर करके।

छोड़ ना 'आदि', सोचना क्या ज़िन्दगी पे,
क्या पायेगा उसके बिना, यूँ फिकर करके।



[ Aashuftaa-sar - Mentally Deranged ]

Wednesday, October 21, 2009

शिकायत ...

हम-कदम बनके कौन, साथ देता है ज़माने में,
क्या लगता है किसी का, मुझ पे यूँ मुस्कुराने में.

अभी तक प्यास बाकी है, गला तर तो है अश्कों से,
महज़ दो कतरा ही उल्फत, तलाशी हर पैमाने में.

कि इस बार सावन से, गुजारिश की थी बहारों की,
खिज़ा का बस मगर डेरा, हुआ इस आशियाने में.

मेरी ही बज़्म में आके, शिकायत मेरी ही करना,
उन्हें क्या लुत्फ़ आता है, हमें यूँ आज़माने में.

कभी मेरे खयालो में, कभी अरमानों में वो हैं,
हमेशा जीते क्यूँ हैं वो, मेरे हर इक फ़साने में.

मरीज़--इश्क बन बैठे, बुलाना क्या हकीमों को,
हमें आराम मिलता है, उन्हीं का गम सजाने में.

उन्हीं की याद में रोकर, बताना आँख में तिनका,
ज़रा देखो अभी तक वो, जवाँ हैं हर बहाने में.

Tuesday, October 13, 2009

अभिलाषा ...

बीहड़ मन में राह सुगम सी, रोज़ बनाती अभिलाषा.
नया पुष्प इक नई आशा का, रोज़ खिलाती अभिलाषा.

अंतर्मन के भाव बहें जब, पलकों से अश्रू बनके,
केश घने हर इक पीड़ा के, रोज़ सहलाती अभिलाषा.

लगता है जब कठिन राह है, मग कंकड़ से अटा पड़ा,
रथ बनके संबल का मुझको, रोज़ घुमाती अभिलाषा.

सागर सा लगता जब मुझको, विकट कर्म कोई अपना,
मेरी सफलता की वो कहानी, रोज़ सुनाती अभिलाषा.

पीछे हटा कभी आगे बढा, रुद्ध मिला कभी मार्ग मुझे,
हाथ पकड़ के आगे चलना, रोज़ सिखाती अभिलाषा.

जब मेरा विश्वास डिगा जब, परछाई भी छोड़ गई,
तिमिर ये मेरा अपनी लौ से, रोज़ मिटाती अभिलाषा.

झंझावात जब सत्-असत्य के, घेर मुझे कभी लेते हैं,
आत्म-विवेचन की शैली से, रोज़ मिलाती अभिलाषा.

व्यर्थ प्रपंचों में फंसकर जब, अच्छा-बुरा 'आदि' भूला,
नई परिभाषा नए मानव की, रोज़ बताती अभिलाषा.

Monday, October 12, 2009

तुझे अब भुला दूँ मैं

ये वाजिब है सनम, तुझे अब भुला दूँ मैं,
मेरे दिल के, हर कोने से, तुझे गला दूँ मैं.

क्यूँ तेरी राह में आऊं, क्यूँ तेरी दीद करूँ,
ना-मुनासिब है, बेसबब तुझे, यूँ रुला दूँ मैं.

खतों में सयाही की जगह, खूँ की खुश्बू है,
चमन लुट गया, अब ख़तों को भी, जला दूँ मैं.

मेरी स्याह रातें कुछ, बेहरारत आज कल हैं,
तेरे हिज्र की, जुम्बिश से, ज़रा हिला दूँ मैं.

क्यूँ अरमाँ आज भी, जागे हैं तेरी खातिर,
खुद को मिटाऊं खुदा, या, इन्हें ही सुला दूँ मैं.

ज़िन्दगी दुश्वार, मौत भी, आती नहीं दिखती,
इश्क की नेमत से इसे, चलो, आज मिला दूँ मैं.

'आदि' को, गिरा दे नज़र से, इल्तजा सुन ले,
फिर मैं, तुझपे नाज़ करूँ, तुझे ये सिला दूँ मैं.

Thursday, October 8, 2009

एक शिकायत ...

जो तूने मेरा दामन, थाम के, न छोड़ा होता,
मुझे दर्द तो होता, मरने का, मगर थोड़ा होता।

जब बिखरा मेरा दिल तो, पछता रहा हूँ मैं,
अपनी साँस को, धड़कन से तो न, जोड़ा होता।

मंजिल-ए-इश्क थी, चंद कदमो पर हमसफ़र,
जो क़ज़ा ने अपनी राहो को, ऐसे न मोड़ा होता।

मैं भी खुश रहता जहाँ में, तुम्हारी तरह बशर,
जो ओढ़ता दोहरा नक़ाब, सीना भी चौड़ा होता।

चैन आ जाता मुझे भी, ख्वाब-ए-सुकूँ आने पर,
मोहब्बत ने अगर, बिस्तर पे, न झिंझोड़ा होता।

मैं भी इन्सान हूँ, जीने की है, तमन्ना मुझ में,
नाज़ुक लम्हों को, पत्थर से तो न, तोड़ा होता।