Thursday, December 23, 2010

मुझसे प्यार मत करना


मेरे गुलशन से, उम्मीद-ए-बहार मत करना,
मैं हूँ पुर-खार, तुम, मुझसे प्यार मत करना.

चेहरा कितना भी हँसीं हो, सितम कर देता है,
न दिल ये फ़िदा करना, नज़रें चार मत करना.

अपने वजूद को, अपने में समेटे रखना अदम,
इश्क में फंस के खुद को, मिस्मार मत करना.

उसे भी, मोहब्बत होगी, तो दे ही देगा जवाब,
उसके क़दमों पे रख ग़ैरत, इज़हार मत करना.

वो तो शौक़ रखते हैं, आशिकों को तड़पाने का,
इंतज़ार तो करना, खुद को बेक़रार मत करना.

संदली से उस बदन में, रहे है फूल जैसा दिल,
शिकवा करके उस हँसीं को, बेज़ार मत करना.

सहरा में रहना बेहतर, बजाय कुरबत-ए-हुस्न,
कभी राह-ए-हुस्न में आदि', दयार मत करना.



[ Pur-khaar - Full of Thorns ]
[ Mismaar - Destroyed ]
[ Gairat - Self Respect ]
[ Bezaar - Displeased ]
[ Sehra - Desert ]
[ Qurbat - Nearness ]
[ Dayaar - Residence ]

Tuesday, September 28, 2010

सबब इंतज़ार का...


कोई तो मुझको बताये, सबब अब इंतज़ार का,
मर्ज़ क्या है क्या दवा, अब दिल-ए-बीमार का.

जान रुख़सत हो रही है, क्यूँ मेरी हर साँस से,
हासिल-ए-चाहत है ये, या सितम है प्यार का.

जोड़कर ज़र्रों को हमने, इक नशेमन था किया,
उसको बिखरा देख, दिल ये, रो रहा बेजार का.

इस कब्र से बहती सदायें, कोई तो सुनले बशर,
मेरी हर इक आह है बस, फ़लसफा, इंकार का.

रोऊँ मैं या रोये तू ये हैं, नेमतें उल्फत की बस,
इस बात पे अब बता क्या, सबब है तकरार का.

बीते लम्हों से रहा ना, कोई शिकवा अब सनम,
कुछ नहीं है, वो महज़ हैं, सोज़ उस इकरार का.

क्यूँ ये तराना दूर से, आता हुआ, अपना सा है,
अब छेड़ता है कौन, 'आदि', साज़ मेरे प्यार का.





[ Sabab - Reason ]
[ Rukhsat - Leave/Dismissal ]
[ Nasheman - Nest ]
[ Bezaar - Displeased ]
[ Soz - Heat/Sorrow ]
[ Saaz - Instrument ]

Monday, September 20, 2010

ग़ज़ल लिख कर ...


ग़ज़ल लिख कर, अपने ग़म दबा लेता था,

ख़यालों की गली से, तुझको बुला लेता था.

कुछ ख्वाब बेचैन होकर, खरोचते थे नज़र,
संग अरमानों के, उनको मैं, सुला लेता था.

वक़्त के पास, यूँ तो न था, कुछ मेरे लिए,
लम्हात-ए-इश्क फिर भी मैं, चुरा लेता था.

कि वक़्त'ए क़ज़ा में, शोर मेरा दिल न करे,
लिहाज़ा, याद में यूँ दौड़ा के, थका लेता था.

अजीब मैं हूँ या अजीब है ये इश्क की रस्में,
जो सितम सहने को, सर मैं झुका लेता था.

गज़ब हुनर है ग़ज़ल में ये सभी की होती है,
वो हो लेते थे खुश औ' मैं ग़म सुना लेता था.

Monday, August 2, 2010

चेहरा नया समझे ...

बची हैं आरज़ू कितनी, उसे क्या ये क़ज़ा समझे,
जो आहट वक़्त ने की थी, उसे तेरी सदा समझे.

कभी जिसने सनम की, रूबरू ही दीद ना की हो,
शब का वो कहर समझे, ख़्वाबों का मज़ा समझे.

नहीं कुछ और गम मुझको, फक्त, एक ये गम है,
कभी तो, वो मुझे समझे, कभी मेरी वफ़ा समझे.

नशेमन पर मेरे चाहत, गिरी है वर्क इक बनकर,
पशेमाँ सोचते हैं, इश्क को हम, क्यूँ खुदा समझे.

वही गम फिर से आके, है बसा गोशा-ए-दिल में,
तुझे पाके जिसको हम, कभी खुद से जुदा समझे.

हम तो थे वही लेकिन, नहीं था हमने गम ओढ़ा,
हम में था, हुसूल-ए-इश्क, वो चेहरा नया समझे.

खुदा से माँगा 'आदि ने, इबादत में सनम तुमको,
दुआ में, नाम जो आया, उसको तुम खता समझे.


[ Gosha - Corner ]
[ Husool - Realisation ]

Wednesday, July 14, 2010

दीवार नहीं हम ...

तेरी ख्वाहिशों के दरमियाँ, दीवार नहीं हम,
पर ऐसा नहीं कि बिन तेरे, बेज़ार नहीं हम.

खुद से करें शिकवा, कि मिल सके न तुम,
या तेरी ही लकीरों का, इख़्तियार नहीं हम.

अग़र मिलने आ सको तो आना शिताब से,
कि रुख्सत के दौराँ करते इंतज़ार नहीं हम.

नशेमन पे आ गिरा मेरे शोला-ए-बर्क इक,
ज़ीनत के जहाँ में करेंगे, यूँ दयार नहीं हम.

इक बर्ग-ए-दरख़्त हैं हम जो टूटा शाख से,
नाता नहीं सबा से, औ' पुर-बहार नहीं हम.

बन जाते हम-क़दम, तेरे हर सफ़र में हम,
ख़िराम तुम न रह सके, बरफ़्तार नहीं हम.

'आदि' बेमेल राब्ता था जो अंजाम ये हुआ,
तुम क्यूँ हुए पशेमाँ जब, शर्मसार नहीं हम.


[ Bezar - Displeased ]
[ Ikhtiyaar - Right to ]
[ Shitaab - Quickly ]
[ Zeenat - Beauty ]
[ Dayaar - Residence ]
[ Barg-e-Darakht - Leaf of a Tree ]
[ Saba - Breeze ]
[ Pur-Bahaar - Abloom ]
[ Khiraam - Slow Paced ]
[ Raabta - Relationship ]
[ Pashemaan - Ashamed ]

Tuesday, July 13, 2010

आशिकों को काम क्या ...

इश्क के मैदाँ में, दूजा, आशिकों को काम क्या,
जंग अपने दिल से है आगाज़ क्या अंजाम क्या.

हुस्न की गलियों से गिले, आज फिर बहने लगे,
मयकशों को फर्क क्या, नाम क्या बदनाम क्या.

रुखसार की, इक दीद पर, दिल बिछा देते हैं वो,
सब फ़िदा तुमपे हुए, ख़ास क्या और आम क्या.

हर आरज़ू भी टूटती है, बिस्तर पे ले के करवटें,
फुरक़तों के दरमियाँ हो, चैन क्या, आराम क्या.

उनकी जुल्फें उनकी रंगत, है इस क़दर हावी हुई,
भूल बैठे हम अदम, है रात क्या, औ' बाम क्या.

हम झुका के नज़र जाना, हर सितम सह जायेंगे,
तौहीन जलवों की करे कमज़र्फ है ये गुलाम क्या.

जब देख लेते हैं तुम्हें तब, पैमाँ देती है ज़िन्दगी,
तुम जुदा होते हो, आती मौत है ये इंतज़ाम क्या.

'आदि' की ही है खता जो, मर मिटा है तुमपे ये,
नज़र तेरी तेरा जलवा, हम दें तुझे इल्ज़ाम क्या.


[ Aagaz - Beginning ]
[ Baam - Morning ]
[ Paimaan - Confirmation ]

Saturday, June 26, 2010

न मेरी चाहत देखी ...

उनकी हर बात में इस दर्जा नज़ाक़त देखी,
इश्क की शक्ल में यूँ रू-ब-रू आफत देखी.

मानिंद-ए-वर्क सी लहराती वो कमर तौबा,
काँधे पे जुल्फों की पनाहों में क़यामत देखी.

मार के इश्क में वो जीने की दुआ करते हैं,
दस्त-ए-क़ातिल में, जाँ की हिफाज़त देखी.

सुर्ख होंठों के पयमाने से मुझे पीने दे ज़रा,
तिश्ना होंठों की है, जाम से खिलाफत देखी.

कोई भी मुझको नहीं मानेगा ख़तावार तेरा,
बज़्म में सबने तेरी नज़रों की शरारत देखी.

इज़हार-ए-इश्क पे लोगों ना उठाओ उंगली,
आशिक़ी में आपकी भी, मैंने शराफत देखी.

'आदि' मुहं फेर कर गुज़रते हो मेरे कूचे से,
न दर्द देखा कभी तुमने न मेरी चाहत देखी.

Sunday, June 20, 2010

तेरी तस्वीर ...

हथेली पर तेरा ही नाम, लिखता हूँ मिटाता हूँ,
तेरी तस्वीर इस दिल में, हर दम ही बनाता हूँ.

बड़ा खुश होता है वो पल, जब ये बात होती है,
तुझे ही लिखके पन्नों पे, तुझको ही सुनाता हूँ.

मुझे ये दाद मिलती है, करम इसमें भी है तेरा,
महफ़िल झूम उठती है, तुझे जब गुनगुनाता हूँ.

रूठा जब भी तू मुझ से, सुकूँ से जी नहीं पाया,
हंसा दे इक दफ़ा तुझ को, ख़ुदाई को मनाता हूँ.

ना जाने तुम ही क्यूँ, आते नहीं हो रू ब रू मेरे,
ज़माना रोता है सारा, मैं तुम को जब बुलाता हूँ.

मुतमव्विल हूँ कि मुफ़लिस हूँ, ये जानता हूँ मैं,
करके दिल के ये सौदे, मैं बस अरमाँ कमाता हूँ.

'आदि' और क्या अंजाम होगा, तेरा उल्फत में,
शब- ए-हिज्राँ में रोता हूँ, वस्ल पे मुस्कुराता हूँ.

Saturday, June 19, 2010

मेरी तन्हाई ...

शब बसर होती है लेकिन, मेरी तन्हाई नहीं,
रु-ब-रु आ कि तूने, मेरी चाह आजमाई नहीं.

इन मेरी आँखों से, मेरा खून जब बहा न हो,
इश्क के बाद ऐसी ज़िंदगी, अभी बिताई नहीं.

ज़माने से कहा कि उसने कुछ बताया न मुझे,
मौत से पहले क्या, दास्तान मैंने सुनाई नहीं.

मैं मगर खुश हूँ अब हिज्र-ए-इश्क में क्यूंकि,
हुआ है इल्म मेरा हासिल उनकी रानाई नहीं.

सिल लिए होंठ ये जब, बज़्म में आये थे तुम,
इश्क ब-इज्ज़त चाहिए, तुम्हारी रुस्वाई नहीं.

क़ीमत इश्क की लगाना ज़माने का हुनर होगा,
तिजारत ये होगी नहीं हमसे, हम सौदाई नहीं.

गुनाह-ए-इश्क में मंज़ूर है, सज़ा-ए-मौत हमें,
झुका दरबार में सिर 'आदि', देगा सफाई नहीं.

बख्शे हैं ...

दर कदम वक़्त ने सीरत पे ज़खम बख्शे हैं,
ज़मीं-ए-ख़ार मुझको, उनको हरम बख्शे हैं.

मेरी नज़रों से, टपकता है, इश्क हर लम्हा,
दिवार-ए-दिल पे स्याह धब्बे, नम बख्शे हैं.

हम-शबिस्ताँ हैं आजकल, महज़ यादें तेरी,
मेरे ख़्वाबों ने मुझे, वस्ल के भरम बख्शे हैं.

कोई न कुछ मांगेगा यारों से अब ज़माने में,
मेरी ख्वाहिश पे मुझे उसने यूँ गम बख्शे हैं.

हो क्या सैयाद से शिकवा औ गिला तीरों से,
जब बागबाँ ने ही, साँसों पर ज़ुलम बख्शे हैं.

न जिन्हें आहों की परवाह, न फिक्र दर्दों की,
वाह ख़ुदा तूने क्या संगदिल सनम बख्शे हैं.

तेरी गलियों में बस इक सदा ही देगा आदि',
मेरी साँसों ने, लम्हात-ए-सब्र कम बख्शे हैं.

तेरी राहों में चले ...

मुन्तज़िर इश्क के बनके, तेरी राहों में चले,
बावस्ता तुझसे होके ख्वाब, निगाहों में चले.

साँसे, आबशार-ए-दर्द में, अब तक थी रवाँ,
ढूंढने मकाँ-ए-सुकूँ हम, तेरी पनाहों में चले.

बला से हुस्न की मलिका हो, शोखियाँ थामे,
सौ फ़साने तुझे देख कर, मेरी आहों में चले.

अब बस, इक दुआ करता हूँ, खुदा से जाना,
मेरी हर सांस, मेरा वक़्त, तेरी बाहों में चले.

तुमने जबसे, इन आँखों से है इकरार किया,
हम भी, हो के शुमार, इश्क के शाहों में चले.

तेरी इक दीद पे सारे पीर, खुदा के हुए हैं उदु,
छोड़ मस्जिद की डगर, राह-ए-चाहों में चले.

नश्तर सी नज़र वाले, आ क़त्ल कर दे मुझे,
ख़ुशी ख़ुशी हम आज तेरी क़त्लगाहों में चले.

बार-ए-इश्क में, ना तेरा गुनाह साबित होगा,
सब अलम सर ले संग 'आदि' गवाहों में चले.

तुमको शिकवे हमसे ...

हुए तुमको शिकवे हमसे, औ' कुछ गिले हुए,
औ' इक उमर गुज़री अपनी, तुमसे मिले हुए.

ना बोल पाए हम कुछ, यूँ रहके भी बा-वफ़ा,
गुज़रे बाज़ार-ए-इश्क से, हम लब सिले हुए.

क्या वक़्त सम्भालेगा, उस आशियाँ को अब,
दरार जिसकी दीवारों में, और बुर्ज हिले हुए.

खुशियों का नाम हमको, अब रहता नहीं याद,
गम-ए-आशिकी से अपने, यूँ सिलसिले हुए.

मुफ़्लिस मैं ज़माने में, जो लुट गया तो क्या,
गिरे हैं शाहों के तख़्त भी, औ' वीराँ क़िले हुए.

थी क्या बिसात 'आदि', जो जिंदा रहते हम,
जब वो बाग़बान ही कुचले, यूँ गुल खिले हुए.


Thursday, March 11, 2010

जबसे तुम्हें देखा है ...


जबसे तुम्हें देखा है न आराम हुआ है,

तीर-ए-नज़र से दिल का काम हुआ है.

लोग दिवाने हुए तो शिकवा कुछ नहीं,
बहका है दिल तो क्यूँ बदनाम हुआ है.

तेरे जमाल को मैं भला चाँद क्या कहूँ,
असफ़ार बशर का उस पे आम हुआ है.

कोशिशे तो की थी मगर ज़ाया हो गईं,
अब क़ज़ा मुहाल जीना नाकाम हुआ है.

अक्सर वो आते जाते हमें देखते भी हैं,
यूँ उनके शौक़ का हमें अक़दाम हुआ है.

शानों पे गिरती जुल्फें रंगत गुलाब सी,
यूँ सबर आज़माने का इंतज़ाम हुआ है.

है शौक दीद का भी है चाहत पनाह की,
वरना कहाँ 'आदि' कभी गुलाम हुआ है.

[ Jamaal - Beauty ]
[ Asfaar - Travel ]
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[ Qazaa - Death ]
[ Muhaal - Difficult ]
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Tuesday, March 9, 2010

यूँ दिल को सताना उनका ...


आते जाते देख कर यूँ मुस्कुराना उनका,
अच्छा नहीं है यूँ दिल को सताना उनका.

मुझसे कसम ली है कि लब ना मैं खोलूं,
औ' बज़्म में मुझे दीवाना बताना उनका.

नमी वो छत की जो देखें और सबब पूछें,
नाम हो मेरा पर हो वजह रुलाना उनका.

कैसे दिल बचाऊँ मैं हीला कोई बतलाओ,
फाल-ए-नज़र को ऐसे आज़माना उनका.

गर इज़हार कर दूंगा, तो भी रूठ जायेंगे,
खामोश लब पे सितम है ये ताना उनका.

संभले तिश्नगी कैसे मेरी हसरतों की अब,
मुझे होंठों की सुर्खी से वो रिझाना उनका.

उनकी गली में आदि' ये पैगाम कह देना,
बिना उनके ना जी पायेगा दीवाना उनका.



[ Sabab - Reason ]
[ Bazm - Gathering ]
[ Heela - Trick ]
[ Phaal - Knife/Blade ]
[ Tishnagi - Thirst ]

Saturday, February 20, 2010

तो कुछ बात बने

तेरे आगोश में आऊँ तो कुछ बात बने,
तेरी रूह में खो जाऊँ तो कुछ बात बने.

नहीं है दुनिया के क़ाबू, मुझे सुकूँ देना,
दर्द मैं तुझको बताऊँ तो कुछ बात बने.

ब'राह नव्ज़ खून मेरा आँख तक आया,
मैं तुझे ज़ख्म दिखाऊँ तो कुछ बात बने.

सबा'ओ'रंग क्या देंगे मुझे रंगत वापस,
तुझे सीने से लगाऊँ., तो कुछ बात बने.

इबादतगाह में क्यूँ टेकूं मैं घुटने जाकर,
तुम्हें फ़रियाद सुनाऊँ तो कुछ बात बने.

तेरी निगार भी रहती है रूठी सी मुझसे,
जब तुझे रू-ब-रू पाऊँ तो कुछ बात बने.

ये मेरे अरमाँ बेकाबू नहीं जीने देते मुझे,
तिश्नगी लब से बुझाऊँ तो कुछ बात बने.

यूँ तो हैं लाख दिवाने तेरे इस 'आदि' के,
आ तुझे इश्क सिखाऊँ, तो कुछ बात बने.


[ Ba'Raah - Via/Through ]
[ Saba - Breeze ]
[ Ibaadatgaah - Mosque/ A place to Worship ]
[ Fariyaad - Complaint/Plea ]
[ Nigaar - Picture/Photo ]
[ Tishnagi - Thirst ]

Friday, February 12, 2010

वफ़ा मांगते हो ...


उजड़े चमन से बहारों की, सबा मांगते हो,
बरबाद मोहब्बत से, हुस्न नया मांगते हो.

बोली लगा के दिल की, सौदा-ए-इश्क में,
पेशा-ए-आशिक़ी से, तुम नफा मांगते हो.

रुखसार की सुर्ख़ी से, जो चाक़ करे सीना,
तुम उन की अदा से, यारों हया मांगते हो.

जब भी वो देखता है, ले लेता है मेरी जाँ,
तुम उससे ही मेरे मर्ज़ की, दवा मांगते हो.

साहिल बदल दिया, मुझे तूफाँ मैं देख के,
तुम ऐसे नाखुदाओं से, क्यूँ वफ़ा मांगते हो.

क्या जी सकूँगा अब मैं, उनके बिना बशर,
क्यूँ लम्बी उम्र की मेरी, यूँ दुआ मांगते हो.

उनसे जुदा हुआ तो, क्या लिख सकूँगा मैं,
मेरी कलम के वास्ते, क्यूँ ज़िया मांगते हो.

जो हुनर 'आदि' होता, वो हासिल हमें होते,
नाकाम परिंदे से, उड़ने की, अदा मांगते हो.




[ Sabaa - Breeze ]
[ Ziyaa - Brilliancy/Shine ]

Tuesday, February 9, 2010

उल्फ़त दे मुझको ...


रुकने की ज़िद ना कर, अब रुखसत दे मुझको,
अगर हो सके तो बस अपनी, हसरत दे मुझको.

मेरे हिस्से में फ़क्त खंडहर हैं, ज़रा देख तो सही,
तू अपनी मोहब्बत की, सीली सी छत दे मुझको.

बड़ी मुश्किल से छूटा हूँ, साक़ी तेरे मयखाने से,
यूँ न देख अब मुझे, न दीदार की लत दे मुझको.

देखते ही ये लोग सताते हैं, तेरा नाम लेके मुझे,
खुद को ही भूल जाऊं, ऐसी वो उल्फ़त दे मुझको.

तुझे देख के भी अज़ल से, न मूँ फेर सकूँ अपना,
मैय्यत सजने से पहले, इतनी ताक़त दे मुझको.

वस्ल का न सही, फुरक़त का ही बयाँ हो जिसमें,
अपनी जफ़ा से सजा तू, कोई तो ख़त दे मुझको.

'आदि' दुश्मन रहे तेरा, तो भी कोई शिकवा नहीं,
तेरा गुनाहगार रहूँ ता-उम्र, ये इजाज़त दे मुझको.

Saturday, January 30, 2010

तू जिसे मिल जाए ...

तू जिसे मिल जाए वो, क्यूँ भला गमगीन हो,
क्यूँ उसे ना नाज़ हो, क्यूँ ना वो खुदबीन हो.

तेरे होंठो की ये जुम्बिश, क़ातिलाना है बड़ी,
गर नज़र उठ जाए तेरी, जाम हर रंगीन हो.

है मुझे मंज़ूर तोहमत, तू अगर दे इश्क की,
औ मौत भी मंज़ूर है गर, ये खता संगीन हो.

वो नहीं आये मेरा दिल, खुश भला कैसे रहे.
कैसे मेरी बाम-ओ-शब, तेरे बिना हसीन हो.

माफ़ कर दे ए खुदा, मैं कर ना पाऊं बन्दगी,
तुझसे बेहतर तो मुझे, दीद-ए-माहज़बीन हो.

दर्द इक होता है दिल में, फुरक़तों की बात पे,
आ मिटा दे इसको, इससे पहले ये पेशीन हो.

लो संभालो दिल मेरा, देखो ज़रा इसे तोड़कर,
सुन रखा है मैंने, तुम इस खेल के शौकीन हो.

इंकार गर हो इश्क से, कुचल देना मुश्क इक,
खामोश लब आदि रहें, न इश्क की तौहीन हो.


[ Khudbeen - Proud ]
[ Pesheen - Old ]

Tuesday, January 19, 2010

क्या कहिये ...


हुस्न क़यामत नज़र क़यामत अदा क़यामत क्या कहिये,
ये जलवे यूँ भी कम ना थे उस पे ये नजाकत क्या कहिये.

मैं काफ़िर था पर मुझको पुजारी बना गई उल्फत उनकी,
अब मुर्दा अरमाँ जीने लगे हैं उनकी इनायत क्या कहिये.

बस उनकी इक मुस्कान पे यारों वार दूँ अपनी हस्ती मैं,
अपनी ही जाँ से कर बैठा ये कैसी खिलाफत क्या कहिये.

नश्तर उनके दस्त में देखा फिर भी सर झुकता ही गया,
शिकवा हम तो कर न सकेंगे रस्म-ए-चाहत क्या कहिये.

ये अर्श के आँसूं दिखे बशर को नाम हँसीं शबनम बख्शा,
और अश्क मेरे मंज़ूर नहीं, क्यूँ आई हरारत क्या कहिये.

यूँ सामने आकर नज़र मिलाकर वो पल्लू दबाये दाँतों में,
दिल न सम्भले आरज़ू पिघले मेरी हिमाक़त क्या कहिये.

खिड़की पर आना ज़ुल्फ़ सुखाने चलके घुंघरूं वाले पैरों से,
तीर-नज़र के वार से नादाँ दिल की हिफाज़त क्या कहिये.

उनकी ही गली में जो रोज़ ही 'आदि' तकते हैं राहें उनकी,
वो इश्क के हमको हश्र बताएं उनकी हिमायत क्या कहिये.

Monday, January 18, 2010

कुछ ऐसा कमाल हो ...


काश इस बार की होली में कुछ ऐसा कमाल हो,
आसमाँ की सुर्खी का सबब प्यार औ' गुलाल हो.

बहुत बार सुने हैं मैंने ख़ुशी में मातम के नगमे,
चाहता हूँ साज़ पर इस दफा दीप-राग बहाल हो.

जज़्बा वो पैदा कर मेरे खुदा देश की आवाम में,
रहीम राम को पुकारे औ क़ाज़ी को न मलाल हो.

कुछ इस तरह से काँधे मिला दें आज अपनों से,
कि आँखों से अश्क बहें तो हाथ अपना रुमाल हो.

महज़ प्यार की ज़ुबान ही पढाई जाए मदरसों में,
और पर्चा-ए-तालीम में सिर्फ प्यार का सवाल हो.

रिश्तों के मसले मिटाना सीखें सभी मोहब्बत से,
भाई-भाई के बीच ए ख़ुदा ख़ंजर ना इस्तमाल हो.

कुछ ऐसे सजाओ अपने गुलशन-ए-हिंद को यारो,
जब भी अमन की बातें हों अपना हिंद मिसाल हो.

ख़ुदा के दर पे आज फिर 'आदि' है चलकर आया,
चढ़ते सूरज के संग मेरे हिंद का बुलंद इक़बाल हो.


[ Iqbaal - Fortune, Prosperity ]

Monday, January 11, 2010

आरज़ू हो जाऊँ मैं तेरी ...

यार से शिकवा हो कैसा, खुद से शिकायत है हमको,
जान से भी प्यारी यारो, उनकी ये नज़ाक़त है हमको.

वो सुर्ख नज़र वो अंगड़ाई, उस पर वो लब अंगारों से,
इक दीद की कीमत ऐसी क्या, आई हरारत है हमको.

खुद बहका सा फिरता है जो, पीके उनकी ही नज़रों से,
बज़्म में आके आज वही, सिखलाए शराफत है हमको.

कौन मरा है किसकी ख़ातिर, कब्र की ताबिश से पूछो,
उस क़ातिल का नाम न लें हम, ऐसी हिदायत है हमको.

अए मेरे तसव्वुर जाग ज़रा, खूँ को ए कलम रवानी दे,
वो पढ़के समायें बाहों में, लिखनी वो इबारत है हमको.

नज़र से यूँ होके गुजरूँ कि, करलूँ ठिकाना दिल में ही,
आरज़ू हो जाऊँ मैं तेरी, क्या इतनी इजाज़त है हमको.

ए ख़ुदा अगर कर पाए तो, 'आदि' पे एहसाँ इतना कर,
महबूब ख़ुदा हो जाए उसी की, करनी इबादत है हमको.