Wednesday, September 17, 2008

मुन्तजिर ...


मुन्तजिर हू मैं शराब--इश्क का साकी मेरे,
नज़र से ऐसी पिला दे होश में मैं रहू.

बुत है कहता कोई तुझको कोई कहता है खुदा,
मेरे दिल का तू खुदा है तुझे जिंदगी क्यूँ ना कहू

आजा मेरे रू--रू तेरी दीद पे मर जाऊ मैं,
जो ना देखू तुझको मैं फिर जीता यू कैसे रहू

कह रहा है हर फ़साना राख से उठता धुंआ,
कब तलक इस इश्क से मैं इस कदर जलता रहू

सजदे करता हूँ खुदा के काश लाये रंग वो,
हर दुआ में पास तू हो मांगता बस ये रहू

रंग--बू गुलशन से चलके तेरे रुख तक आए हैं,
है तमन्ना मेरी तेरी जुल्फों में सोता रहू

क़ैद कर ले मुझको अपने दिल में तू मेरे सनम,
कब तलक में इस जहान में यू भटकता ही रहू.

Tuesday, September 9, 2008

राख हू या गर्त हू ...

राख़ हू या गर्त हू अब ना पता है ये मुझे,
उसके क़दमो पे जो आऊ तो मुझे एहसास हो.

दिल में मेरे है बसा वो फरक अब कुछ है नही,
वो रहे फिर दूर दिल से ये मेरे वो पास हो.

रक्स--गम की एक महफिल हम सजा तो ले सनम,
पर इश्क तेरा दिल में लेके कैसे ये अंदाज़ हो.

शब् में है तेरा ही जादू सहर में तेरी अदा,
क्यूँ मुझे फिर अपने दिन--रात पे ना नाज़ हो.

Wednesday, September 3, 2008

बे-इरादा नज़र...

बे-इरादा नज़र मेरी उनसे जब टकराई थी,
उफ़ क्या थी वो इक क़यामत मेरे दिल पे आई थी,

वो चलें तो सुबह चलती पलकों पे झुकती है शाम,
उनके नूर--हुस्न से ये चांदनी शरमाई थी.

अब्र भी हलचल में अपनी उनके नखरे है लिए,
खूशबू चमन ने भी उनकी साँस से ही पाई थी.

ये ज़मीन उनकी अदा से डोलती है दीवानों सी,
उनकी आँचल की पनाहों से बहारें आई थी.

बस इसी शोखी के रहते दिल मेरा उनका हुआ,
उनके रुख की दीद को ही नज़र फिर लहराई थी.

ये वजूद--दिल में मेरे क्या कसक है छा गई,
ये मोहब्बत उनकी थी या उनकी ये अंगड़ाई थी.

खुशनुमा मौसम है सारा,नज़्म अब है हर जवान,
मेरी ग़ज़ल के साथ उनके दिल की वो शेहनाई थी.