Sunday, December 20, 2009

ज़माने वाले ...

मोहब्बत को मजाक़ समझते हैं ज़माने वाले,
फिर मुझे क्या खाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

मैं तो बस उल्फत की पैरवी में रहता हूँ यारों,
मेरे अंदाज़ को बेबाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

खुद में पैवस्त किया है उसको इश्क के चलते,
क्यूँ मुझे गिरेबाँ चाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

इन अदाओं से ही जीती बाज़ी--इश्क उसने,
फिर क्यूँ उसे चालाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

हमें तो जीने की अदा सिखा गया इश्क उनका,
नादाँ हैं जो हमें हलाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

मेरी सांस को नव्ज़ों के खूँ को रवानी दी उसने,
तो क्यूँ उसे ख़तरनाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

उनके ही सजदे करते हैं फक्त इक दीद के लिए,
हमारी तरह उन्हें पाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

कि उनकी रुसवाई के डर से दूर हुआ है 'आदि',
ज़ब्त--गम--फ़िराक़ समझते हैं ज़माने वाले.

Tuesday, December 8, 2009

बदलना सबको पड़ता है...

मुसीबत सब पे आती है, लड़ना सब को पड़ता है,
कदम थकते हैं सब ही के, चलना सब को पड़ता है.

हमेशा ही जीत हो हासिल, ज़रूरी ये नही होता,
कभी हार कर ख़ुद को, संभलना सब को पड़ता है.

बसर करती हैं गुलशन में, खिज़ाएँ भी बहारें भी,
हँसीं होता है गुल लेकिन, बिखरना सब को पड़ता है.

थोड़ा मैं संभल जाऊं, ज़रा तुम भी संभल जाओ,
जहाँ में दौर--फुरक़त से, गुज़रना सबको पड़ता है.

कभी खुशियाँ मिलती हैं, कभी गम भी बरसते हैं,
ये दो साँचे हैं जीवन के, ढलना सब को पड़ता है.

ना खोना होश तू अपने, जो बिछड़े कोई भी अपना,
बिसात--उल्फतें हैं ये, बहलना सब को पड़ता है.

ये अकेला मैं नहीं कहता, तुझे भी इल्म ये होगा,
गुज़रते वक्त के संग संग, बदलना सब को पड़ता है.

थपेड़े 'आदि' सहने हैं, जो कश्ती डाली दरिया में,
बहर--ज़ीस्त गहरा है, निकलना सब को पड़ता है.




[ Bahar-e-Zeest - The Sea Of Life ]

Sunday, November 29, 2009

उधार की सांस ...

इक उधार की सांस लिए,
मन में चुभी इक फांस लिए,
चलता हूँ फिर उन गलियों में,
तुमसे मिलने की आस लिए.

कोई मिला ना मोड़ों पर,
छान ली सारी राख प्रिये,
अकेलापन और चाहत थी,
और एक था मैं वनवास लिए.

है याद मुझे वो हर इक क्षण,
जो हमने साथ बिताया था,
चूनर काँधों पे डाले हुए,
तुम आती थी मधुमास लिए.

वो प्रेम प्रतिज्ञा तोड़ तो दूँ,
पर तुमको कैसे त्यागूँ मैं,
स्वयं को कैसे झुठला दूँ,
मन में तेरा विश्वास लिए.

ये आस का पंछी चाहता है,
तोड़ दे पिंजरा दुनिया का,
पर तुम भी कुछ असहाय सी हो,
और मैं भी हूँ अवसाद लिए.

कौन हूँ मैं ना जानता हूँ,
जबसे मैं दूर हुआ तुमसे,
हर ख़ुशी भी रूठी है मुझसे,
है जीवन भी प्रवास लिए.

Wednesday, November 25, 2009

फ़ना हुए जाते हैं ...

हिजाब--शौक़ में फ़ना हुए जाते हैं,
तेरी दीद पे सौ अफ़साने बने जाते हैं.

नशे में अब तलक है ये अयाम मेरा,
ताशब जो तेरी नज़र से पिए जाते हैं.

किस से मकान--यार का पता पूछूं,
ये चिराग तेरी साँसों से बुझे जाते हैं.

कश्ती का हश्र बावस्ता तूफाँ से भी है,
साहिल को क्यूँ इल्ज़ाम दिए जाते हैं.

रंग ' नूर से अपनी पहचान भी थी,
तो क्यूँ हर्फ़ ' खूँ स्याह हुए जाते हैं.

गुलों की हसरत में कांटे भुला देना,
आबरू बचाने इनके पर्दे किए जाते हैं.

मुझे भुला दे ये भी कहते हैं तेरे अपने,
' तेरे सामने मेरा नाम लिए जाते हैं.

इल्तजा है इक नज़र 'आदि' पे कर दे,
इसी ख्वाहिश में अब तक जिए जाते हैं.

Sunday, November 1, 2009

शर्मिंदा हूँ मैं ...

इश्क की रुसवाईयों से आज शर्मिंदा हूँ मैं,
क्या बताऊँ कैसे यारो अब तलक ज़िंदा हूँ मैं.

लुट गई परवाज़ जिसकी आसमाँ भी गैर है,
उड़ रहा है बे-सबब वो लाचार परिंदा हूँ मैं.

खूँ-ए-दिल से जिस शहर में खेलते हैं होलियाँ,
उस शहर बे-दर्द का ही एक बाशिंदा हूँ मैं.

रोकता है जो सभी को राह-ऐ-उल्फत से खुदा,
इश्क के हर राज़ कहता इक नुमाइन्दा हूँ मैं.

ख़ुद अंधेरे में रहा ता-उम्र जो हँसते हुए,
रौशनी गैरों को देता था वो ताबिंदा हूँ मैं.

बेरुखी सहता था उनकी दर्द सारे चूम कर,
इश्क की हर शय का यारो एक याबिन्दा हूँ मैं.

बढ़ रहा हूँ अपनी राहो पर या मैं अनजान हूँ,
या सफर-ऐ-मौत का गुमनाम कारिन्दा हूँ मैं.



[ Bashinda - Resident ]
[ Numainda - Agent ]
[ Tabinda - Bright,Illuminated ]
[ Yabinda - Recipient ]
[ Karinda - Journeyman ]

Tuesday, October 27, 2009

कलेजा चीर गया ...

कलेजा चीर गया, बस इक नज़र करके,
होश छीन ले गया, मय सा असर करके।

आरजू भी उसकी, शिकवा भी है उसी से,
कहाँ खो गया है वो, मेरा ये हशर करके।

किसी काम का न रहेगा, ये मकाँ-ए-दिल,
छोड़ नशेमन न जा, कुछ दिन बसर करके।

तब से ही अब्र से, तोड़ दिया नाता हमने,
जब से तू गुज़रा है, काँधे पे चुनर करके।

मेरा होना गर तुझे, खल रहा है बज़्म में,
तो चलता हूँ तेरे हवाले, जाँ-जिगर करके।

क्यूँ इस कदर हावी है, बस तमन्ना तेरी,
रो रहा हूँ खुद को मैं, आशुफ्ता-सर करके।

छोड़ ना 'आदि', सोचना क्या ज़िन्दगी पे,
क्या पायेगा उसके बिना, यूँ फिकर करके।



[ Aashuftaa-sar - Mentally Deranged ]

Wednesday, October 21, 2009

शिकायत ...

हम-कदम बनके कौन, साथ देता है ज़माने में,
क्या लगता है किसी का, मुझ पे यूँ मुस्कुराने में.

अभी तक प्यास बाकी है, गला तर तो है अश्कों से,
महज़ दो कतरा ही उल्फत, तलाशी हर पैमाने में.

कि इस बार सावन से, गुजारिश की थी बहारों की,
खिज़ा का बस मगर डेरा, हुआ इस आशियाने में.

मेरी ही बज़्म में आके, शिकायत मेरी ही करना,
उन्हें क्या लुत्फ़ आता है, हमें यूँ आज़माने में.

कभी मेरे खयालो में, कभी अरमानों में वो हैं,
हमेशा जीते क्यूँ हैं वो, मेरे हर इक फ़साने में.

मरीज़--इश्क बन बैठे, बुलाना क्या हकीमों को,
हमें आराम मिलता है, उन्हीं का गम सजाने में.

उन्हीं की याद में रोकर, बताना आँख में तिनका,
ज़रा देखो अभी तक वो, जवाँ हैं हर बहाने में.

Tuesday, October 13, 2009

अभिलाषा ...

बीहड़ मन में राह सुगम सी, रोज़ बनाती अभिलाषा.
नया पुष्प इक नई आशा का, रोज़ खिलाती अभिलाषा.

अंतर्मन के भाव बहें जब, पलकों से अश्रू बनके,
केश घने हर इक पीड़ा के, रोज़ सहलाती अभिलाषा.

लगता है जब कठिन राह है, मग कंकड़ से अटा पड़ा,
रथ बनके संबल का मुझको, रोज़ घुमाती अभिलाषा.

सागर सा लगता जब मुझको, विकट कर्म कोई अपना,
मेरी सफलता की वो कहानी, रोज़ सुनाती अभिलाषा.

पीछे हटा कभी आगे बढा, रुद्ध मिला कभी मार्ग मुझे,
हाथ पकड़ के आगे चलना, रोज़ सिखाती अभिलाषा.

जब मेरा विश्वास डिगा जब, परछाई भी छोड़ गई,
तिमिर ये मेरा अपनी लौ से, रोज़ मिटाती अभिलाषा.

झंझावात जब सत्-असत्य के, घेर मुझे कभी लेते हैं,
आत्म-विवेचन की शैली से, रोज़ मिलाती अभिलाषा.

व्यर्थ प्रपंचों में फंसकर जब, अच्छा-बुरा 'आदि' भूला,
नई परिभाषा नए मानव की, रोज़ बताती अभिलाषा.

Monday, October 12, 2009

तुझे अब भुला दूँ मैं

ये वाजिब है सनम, तुझे अब भुला दूँ मैं,
मेरे दिल के, हर कोने से, तुझे गला दूँ मैं.

क्यूँ तेरी राह में आऊं, क्यूँ तेरी दीद करूँ,
ना-मुनासिब है, बेसबब तुझे, यूँ रुला दूँ मैं.

खतों में सयाही की जगह, खूँ की खुश्बू है,
चमन लुट गया, अब ख़तों को भी, जला दूँ मैं.

मेरी स्याह रातें कुछ, बेहरारत आज कल हैं,
तेरे हिज्र की, जुम्बिश से, ज़रा हिला दूँ मैं.

क्यूँ अरमाँ आज भी, जागे हैं तेरी खातिर,
खुद को मिटाऊं खुदा, या, इन्हें ही सुला दूँ मैं.

ज़िन्दगी दुश्वार, मौत भी, आती नहीं दिखती,
इश्क की नेमत से इसे, चलो, आज मिला दूँ मैं.

'आदि' को, गिरा दे नज़र से, इल्तजा सुन ले,
फिर मैं, तुझपे नाज़ करूँ, तुझे ये सिला दूँ मैं.

Thursday, October 8, 2009

एक शिकायत ...

जो तूने मेरा दामन, थाम के, न छोड़ा होता,
मुझे दर्द तो होता, मरने का, मगर थोड़ा होता।

जब बिखरा मेरा दिल तो, पछता रहा हूँ मैं,
अपनी साँस को, धड़कन से तो न, जोड़ा होता।

मंजिल-ए-इश्क थी, चंद कदमो पर हमसफ़र,
जो क़ज़ा ने अपनी राहो को, ऐसे न मोड़ा होता।

मैं भी खुश रहता जहाँ में, तुम्हारी तरह बशर,
जो ओढ़ता दोहरा नक़ाब, सीना भी चौड़ा होता।

चैन आ जाता मुझे भी, ख्वाब-ए-सुकूँ आने पर,
मोहब्बत ने अगर, बिस्तर पे, न झिंझोड़ा होता।

मैं भी इन्सान हूँ, जीने की है, तमन्ना मुझ में,
नाज़ुक लम्हों को, पत्थर से तो न, तोड़ा होता।

Monday, September 21, 2009

चले कहाँ तुम महफिल से ...

हुस्न क़यामत सा लेके ये, चले कहाँ तुम महफिल से,
कुछ देर खुदाया रुक जाओ, अरमान हुए हैं गाफिल से।

देखा है क्या तुमने किसी को, दुआ मौत की करते हुए,
खन्जर देके हाथ में उनके, करते हैं गुजारिश कातिल से।

अपनी कचहरी चौखट तेरी, जुल्फें तेरी अपनी सज़ा,
हमको शिकायत कोई नहीं, मिलें भला क्यूँ आदिल से।

कोई तो सहारा दे दो ज़रा, कोई तो घर तक पहुँचा दो,
जबसे नज़र में आये हैं वो, बन बैठे हम बिस्मिल से।

अब हाल मरीजों वाला है, ना कोई दवा ना दुआ लगे,
क्यूँ ऐसे हाल में छोड़ गए हैं, पूछे कोई उस संगदिल से।

कैसे मनाऊं अब मैं खुदा को, कैसे दुनिया को समझाऊं,
रीत-रिवाज ये तालीमों के, क्यूँ पूछते हो मुझ जाहिल से।

गर साथ यूँ ही तुम चलते रहो, सफ़र ख़तम ना होने दूँ,
हम-राह रहोगे सनम मेरे, क्या करना मुझको मंजिल से।

डर क्या होगा मौजों का और, तूफानों से खतरा क्या,
'
आदि' की कश्ती ही लगी है, तेरी बाहों के साहिल से

Friday, September 11, 2009

सवाल ...

दौर--खिज़ा हैं गुलशन में जाना कैसा,
इन टूटे ख्वाबों से रातों को सताना कैसा।

ज़िन्दगी तो यूँ तन्हा भी गुज़र जायेगी,
फिर इसे समझाना कैसा बहलाना कैसा।

मेरे आते ही जो मुंह फेर लिया है उसने,
उसकी साँसों पे फिर हक जताना कैसा।

उसकी फुरक़त में बेचैन हुआ है दिल ये,
खाम्खा झूठी ख़ुशी का फिर बहाना कैसा।

तोड़ के नाते सभी गैर की महफिल में है,
प्यार से रिश्ता फिर झूठा निभाना कैसा।

तुम कभी इश्क करो और तन्हा हो जाओ,
वो जब भुलाये तुम्हें लगता है बताना कैसा।

ग़म ये सारे मुझे हम-सफ़र से लगते हैं,
फिर 'आदि'...रोना कैसा मुस्कुराना कैसा।

Monday, September 7, 2009

इक रोज़ चले हम ...


अरमानों को सहेज कर इक रोज़ हम चले,
ख़त में इश्क भेज कर इक रोज़ हम चले.

उनका मकान दूर था कुछ अपनी गली से,
फिर चाल अपनी तेज़ कर इक रोज़ हम चले.

यारो उनकी दीद की हमें जो आरजू रही,
उस मर्ज़ से परहेज़ कर इक रोज़ हम चले.

शय भी थी इक मात भी कुछ सूझा नहीं हमें,
उस इश्क से गुरेज़ कर इक रोज़ हम चले.

उम्र अपनी फ़ना करके ये दिल था रो रहा,
रगों को फिर नौ-खेज़ कर इक रोज़ हम चले.

भागते ना 'आदि' यूँ जो जीत सकते हम,
ज़ीस्त सजदा-रेज़ कर इक रोज़ हम चले.



[Gurez - Avoiding]
[Nau-khez - Youthful]
[Sajda ' rez - Bowed]

Saturday, September 5, 2009

सलाम लिए जा ...

गम-ए-फुरक़त का यार इक सलाम लिए जा,
फहरिस्त-ए-दीवानों में एक और नाम लिए जा।

लुट गई आज फिर से जो तेरे नाम के साथ,
मेरी महफिल की फिर से इक शाम लिए जा।

गम-ए-दौराँ से किस बात पे तू डर रहा है दिल,
उनकी इबादत में उनका बस अब नाम लिए जा।

मिल जाएँ राह में तो उनसे कह देना बशर,
यहाँ कोई मर गया है उनपे ये पैगाम लिए जा।

बिना तेरे मुझे कैसे हो सुकून इस सेज पर,
आ तू मेरी कबर से सभी आराम लिए जा।

इश्क तुझसे करके जो हुई थी खता कभी,
मुस्कुरा के तू अपने भी इन्तक़ाम लिए जा।

बसर 'आदि' का मुनासिब है नहीं इस शहर में,
अब ख़ुश हूँ वीराने में ये सब इंतज़ाम लिए जा।

Sunday, August 30, 2009



मेरी इन आँखों में उल्फत की नमी रह गई,
सब कुछ पास है मेरे बस तेरी कमी रह गई।

बाम-ए-दिल
बनाया था तेरी हसरतों को,
दिल के कूचे में मगर याद शबनमी रह गई।

कुरेद कुरेद के इश्क को निकाला था मैंने,
खूँ में ज़ालिम की कुछ बूंदे जमी रह गई।

इश्क़ की तलब में सफ़र मीलों का फ़ना करके,
तेरी महफिल में मेरी चाल कुछ थमी रह गई।

यूँ ही अब मेरे गुलशन तक ये भी नहीं आती,
बहारें भी आज कल परस्त-ओ-मौसमी रह गई।

ज़ीस्त में अब बचा कुछ ना सिवा वीरानी के,
'आदि' के हाथ में तेरी कुछ यादें रेशमी रह गई।



[बाम - छत]

Thursday, August 27, 2009

जारी है ...

छलनी बदन से एहसास रिसना जारी है,
मेरी रूह से उनकी आस रिसना जारी है।

भले ही मुरीद हो चुका हूँ मैं खुदा तेरा,
इबादत में उनका इख़लास रिसना जारी है।

माना पत्थर कर लिया है मैंने दिल मेरा,
अभी जुदाई का मगर हरास रिसना जारी है।

देख के तेवर यकीँ तो हो चुका है मगर,
तेरे इक फ़ज़ल का ये काश रिसना जारी है।

फटे हाल तबियत में अपनी अब जादू कैसा,
मेरे लिबास से तेरा लिबास रिसना जारी है।

यूँ तो अब अब्र से बरसा है रहम कुदरत का,
तेरी दीद की ज़हन से प्यास रिसना जरी है।

'आदि' ने तो फेक दिए घुंघरूं हर चाहत के,
मगर अभी उल्फत का रक़्क़ास रिसना जारी है।




[Ikhlas - Love]
[Haras - Fear]
[Raqqaas - Male Dancer]

Wednesday, August 26, 2009

माँ ...


मेरी
हर बात का बस वो ख़याल रखती है,
मेरी गलती का भी न कोई मलाल रखती है।

बड़ी ही इबादत से खुदा को मनाते हैं लोग,
माँ मेरी उससे भी ज़्यादा जलाल रखती है।

सारे रंग मेरी ज़िन्दगी के जब भी रोते हैं,
माँ मुझे हंसाने मुट्ठी में गुलाल रखती है।

कमज़ोर पाकर मुझे किसी मोड़ पर माँ,
मंजिलों की हैसियत के आगे सवाल रखती है।

नाज़ुक हालात् में भी मुझे टूटने नहीं देती,
ख़ुद तपकर माँ मेरी खुशियाँ बहाल रखती है।

कोई ज़ाम उसके दिल में आते नहीं देखा,
ख़ुद मिटके सँवारने की माँ मिसाल रखती है।

'आदि' की नव्जों में लहू बनके ख़ुद बहती है,
ये जादूगरी माँ अपने आँचल में कमाल रखती है।



[Zaam - Proud]

Monday, August 24, 2009

वक्त है संग्राम का ...

अब निशाँ ढूढेंगे मिलके दुश्मन-ए-गुमनाम का,
सरफरोशों को बुला लो वक्त है संग्राम का।

शान पे ऊँगली उठी है अब भला क्या सोचना,
कुर्बानियां देनी ही हैं तो डर नहीं अंजाम का।

देखो कितने ही दिए अब जल उठे इस राह में,
देखो कैसा है हुनर परवानों के पैगाम का।

हमको ही लड़ना है और जीत हासिल चाहिए,
गैरों से अब न लुटेगी है ये फ़ैसला आवाम का।

अब शहीदों की चिताएं न रोयेंगी लाचारी पे,
ढूँढ लेंगे अब पता हम ज़फर के मुकाम का।

दिल को अपने थाम जाँ को ले हथेली पे ज़रा,
दुश्मनी हमसे जो की फिर न रहेगा काम का।

आँसुओ का बदला तेरे खून से लेंगे उदु,
है अगर दम आ ज़रा हो फ़ैसला हर शाम का।

Saturday, August 22, 2009

कलम ख़ुद लिखने लगी ...


याद जब आई तेरी कलम ख़ुद लिखने लगी,
फिर सुरूर-ए-इश्क में बेखुदी बढ़ने लगी।

हुस्न कागज़ पे है उतरा क्या खता मेरी बता,
रफ़्तार पे जब कलम आई इसपे तू दिखने लगी।

मोल देके कौन सा तू अब खरीदेगा वफ़ा,
इश्क के शहरों में कबसे आरजू बिकने लगी।

सर्द नव्जों में थी सिहरन दूर था जब मुझसे तू,
तेरे एहसासों की गर्मी से साँस ये चलने लगी।

एक तेरी दीद से ये नूर उतरा है ज़ीस्त में,
शाम-ए-गम भी धीरे धीरे ए सनम ढलने लगी।

पहले नज़रें फिर मिला दिल फिर फ़साना बन गया,
हौले हौले फिर मोहब्बत परवान ये चढ़ने लगी।

थोड़ी हिम्मत आई है महफिल में जो देखा तुझे,
मुड़ के फिर जब देखा तूने ये ज़ुबाँ हिलने लगी।

तुझसे मिलके कुछ गुमाँ सा 'आदि' को ये हो गया,
जैसे गर्त-ए-ज़मीं उड़के फलक से मिलने लगी।




[zeest = Life]
[Gumaan = Thought/ Doubt]

Friday, August 21, 2009

तेरे बिना ...


तेरे बिना वक्त के हर करम नागवार गुज़रे,
सूखे सूखे से फिर ये मौसम--बहार गुज़रे।

मेरी रूह को उल्फत ने सज़ा कुछ यूँ दी है,
तेरी यादों में मेरे सब ख्वाब बेज़ार गुज़रे।

जब तक अनजान था कुछ गुमाँ खुशी का था,
तड़प उठा मैं जब तेरे लबों से इन्कार गुज़रे।

दौलत--इश्क बस दिल की बदौलत है मगर,
ज़माने से मिलके नज़रों से सौ बाज़ार गुज़रे।

तुझसे मिलने की तमन्ना में जिया मैं अब तक,
तेरी इक ना के बाद मौत से सौ इज़हार गुज़रे।

नहीं खींच पाता 'आदि' को कोई अपनी तरफ़,
हसीँ चेहरे यूँ तो इन नज़रों से कई बार गुज़रे।

Tuesday, August 18, 2009

कुछ सूखे पत्ते गवाह हैं ...


पुराने दरख्तों के कुछ सूखे पत्ते गवाह हैं,
मैंने भुला दिया है तुझे जान ये अफवाह हैं।

कोई मेरे रूबरू आके तेरा नाम लेगा कैसे,
मेरी मोहब्बत की शिद्दत से सब आगाह हैं।

ज़माने की गुलामी हमें करनी नहीं आती,
मुफ़लिस ही सही मग़र दिल के बादशाह हैं।

मौत भी मंज़ूर है जो इश्क की हासिल मिले,
ये हश्र भी मंज़ूर है और सर इश्क के गुनाह हैं।

माफ़ करदे साक़ी मुझको मैं भुला बैठा तुझे,
हाथ में पर आज मेरे सिर्फ जाम--निगाह हैं।

डर ना अब तूफाँ का है ना फिक्र मौजों की रही,
साथ बनके नाखुदा वो और वो ही हम-राह हैं।

हुस्न-ए-तलब देख
ले बशर आज 'आदि' का,
बस तमन्ना उनकी दिल में ख्वाब बाकी स्याह हैं।



[
Husn-e-talab' - Way of Wanting/Desiring]
[Syaah - Dark]

Friday, August 14, 2009

वजह ...


हर घड़ी लता हूँ मैं, साथ लेके प्यार को,
तन्हा तन्हा कैसे काटूँ, ज़िन्दगी दुश्वार को

कभी करके मिन्नतें, कभी करके बंदगी,
धीरे धीरे बढ़ा रहा हूँ, इश्क के व्यापार को

जब कभी वो आयेंगे, अपना कर लेंगे मुझे,
आस दिल में ये लिए,
रखता हूँ इंतज़ार को

क़त्ल भी हो जाऊं मैं, जो इक इशारा वो करें,
इस बहाने देख लूँगा, उनकी नज़र की धार को

चाँद कहते हैं उन्हें सब, मरने वाले हुस्न पे,
सब तड़पते हैं गली में, उनके इक दीदार को

नाम उनका लेते लेते, हो रहा है ये फ़ना,
और कोई रट नहीं, मेरे दिल--बीमार को।

नज़र तो कह ही गई है, जो है मंज़र इश्क का,
लब तलक आने में लगता है, वक्त हर इकरार को।

आईने से दुश्मनी, अपनी भी है इक उम्र से,
हमसे पहले हर सुबह वो, घूरता था यार को

Wednesday, August 12, 2009

हुस्न ...


अंगड़ाई
में शोखी गज़ब की, निगाहों में हिजाब है,
या खुदा ये मेरा सनम है, या की मेरा ख्वाब है

सुरमई आँखें ये ज़ुल्फें, ढलती शानों पे चुनर ,
किस मुसव्विर ने रचा है, ये हुस्न तो नायाब है

जो कमर में बल पड़ा, झुक गई कायनात ये,
बेतहाशा हुस्न पे वाह !, चांदनी सा आब है

होंठों से एक बार पीके, अब तलक हैं सुरूर में,
क़ैद उनकी हर नज़र में, उल्फत का इक सैलाब है

कत्ल करके मुस्कुराना, और झुकाना ये नज़र,
हर अदा मेरे खुदा उफ्फ, उन में बेहिसाब है

दरमियाँ दूरी रहे , सनम कुछ ऐसा कर,
तुझपे लुटने की तमन्ना में, साँस हर बेताब है

मेरी तो शाम--सुबह तू , दुनिया भी तू ही सनम,
है फलक गर दिल मेरा तो, इसका तू माहताब है

Tuesday, August 11, 2009

सफर ...


बड़ी रुस्वाइयां लेकर, चला था उस शहर से मैं,
खुदा ही जानता है ये, बचा कैसे कहर से मैं

अँधेरा इश्क ने करके, उजाडा है चमन मेरा,
भला अब नूर की ख्वाहिश, करू कैसे मेहर से मैं

बड़ी चाहत थी दुनिया को, जनाज़ा देख ले मेरा,
बड़ी ही सख्त जाँ निकला, मरा जो ज़हर से मैं

जहाँ तन्हाइयों का घर, मोहब्बत की तिजारत है,
मजारें हैं जहाँ दिल की, हूँ गुज़रा उस शहर से मैं

बड़ी मुश्किल में कश्ती थी, शबाबों पे थी वो मौजे,
था रूठा नाखुदा फिर भी, बचा कैसे लहर से मैं

सनम तेरी ही तरह सब, छुपाके बैठा है वो भी,
भला गौहर बता कैसे, चुरा लूँ इस बहर से मैं

मेरे हाथो में जो भी था, मेरी किस्मत ने है लूटा,
फकीरों की है ये बस्ती, क्या मांगू इस दहर से मैं




[मेहर- सूरज]
[गौहर - मोती/रत्न]
[बहर- सागर/समुद्र]
[दहर- दुनिया]

Sunday, August 9, 2009

जुदा करके सफीने से, ना ऐसे मुस्कुराओ अब,
बड़ी ज़ालिम हैं ये मौजें, ना ऐसे यार जाओ अब

मेरे दिल से भले खेलो, मुझे ऐतराज़ ना होगा,
मगर मिल मिल के गैरों से, इसे यूँ ना जलाओ अब

कभी कहते थे होगा वक्त तो, दोगे जवाब--दिल,
वही फिर पूछता हूँ मैं, मुझे कुछ तो बताओ अब

ज़रा जाओ बाहों में, तमन्ना की गुजारिश है,
कि ऐसे दूर रह रह कर, मुझे यूँ ना सताओ अब

मेरी कुछ उलझनें ऐसी हैं कि, घबरा रहा हूँ मैं,
तुम हर राज़ से परदा, सनम आके उठाओ अब

ना मुझको ये जहाँ देखे, जहाँ को मैं भी ना देखूं,
मुझे ऐसा ठिकाना
दो, मुझे ऐसे छिपाओ अब


[Safeena - Boat]

Friday, July 31, 2009


मेरे सीने से मेरे, ज़ख्म ना चुराओ ऐसे,
अभी सोया हूँ, अभी तो ना सताओ ऐसे।

कभी तो मेरे वजूद पे भी, नज़र आएगी,
रौशनी रहने दो कब्र पे, ना बुझाओ ऐसे।

लाख अरमानों का, मंज़र सजा रक्खा है,
ना दूर जाओ मुझे, अब ना रुलाओ ऐसे।

मेरी हस्ती को, तेरी आस का सहारा है,
मानिन्द-ए-वक़्त, तुम तो ना जाओ ऐसे।

जान भी दे दूं गर, इसमें ही रज़ा है तेरी,
वो अदा तो दिखे, साँसों पे हक़ जताओ ऐसे।

मैं नहीं तूफाँ जो, वीरानियाँ दे जाऊंगा,
मेरी राहों को, अज़ल तो ना दिखाओ ऐसे।

अब कहाँ आब है, रंगत है चमक है मुझ में,
मैं तो वीराना हूँ, मुझको ना सजाओ ऐसे।


[अज़ल = म्रत्यु / मौत]

Sunday, July 26, 2009

बड़े अरमान से ये कमरा, संवारा है मैंने,
दिल जिसे कहते हैं, उल्फत में निखारा है मैंने

मेरे होश में आने का ना, इंतज़ार करना यारो,
जाम--मोहब्बत को, सीने में उतारा है मैंने

उम्मीद है कि उनका भी, जवाब आएगा,
बड़ी शिद्दत से मेरी जान, पुकारा है मैंने

हजारों दाग दिल में थे, हजारों ऐब भी देखे,
बड़ी मुश्किल से अब, दिल को सुधारा है मैंने

नज़र में आशियाँ तेरा, रगों में तू रवाँ है बस,
तुझ बिन जी ना पाएंगे, किया इशारा है मैंने

तुम्हारे बिन नहीं है कुछ ,कि ये बस जानता हूँ मैं,
कि जुदा होके इस वक़्त को, बस गुज़ारा है मैंने

मुझे बस जुस्तजू तेरी, सहारा भी एक तेरा है,
कि बाकी चाहतों को, सीने में ही मारा है मैंने

Saturday, July 25, 2009

बिस्तर की सिलवटों ने ...

बिस्तर की सिलवटों ने, ये पैगाम लिख दिया,
ता-शब चली जद्दोजहद, इश्क नाम लिख दिया.

तब होश भी जाता रहा और, चैन भी आता रहा,
जब यार ने मेरे लबों पे, अपना नाम लिख दिया.

दिल ये तड़पा बहुत था और, जागे थे अरमाँ सभी,
जब उसने हसरतों को, सर-ए-शाम लिख दिया.

हमने पूछा कुछ पता तो, दे दो दर-ए-सुकून का,
उसने अपनी जुल्फों का, साया तमाम लिख दिया.

जब खुदा से पूछा मैंने, क्या है अब किस्मत मेरी,
उसने भी उनकी मोहब्बत, सर अंजाम लिख दिया.

होश की बेहोशी पर ना, आया उनको कुछ रहम,
बस यू तड़पना ही मेरा, अय्याम लिख दिया.

जीना भी सीखा हूँ मैं बस, जबसे पाया है उन्हें,
दिल ने उनके फज़ल का, एहतराम लिख दिया.
बस एक खनक की चाहत में, मैं खुद को साज़ बना बैठा,
खुद ही ना जिसको समझा मैं, खुद को वो राज़ बना बैठा.

ज़मीन पे गिरके तड़पा भी पर, हासिल कुछ ना हाथ लगा,
जिसने पर मेरे छीन लिए, मैं वो परवाज़ बना बैठा.

लोग तो मुझसे कहते थे पर, जाहिल मैं ही था शायद,
जो खुद ही अपने कातिल को, अपना सरताज बना बैठा.

क्या मुझे इल्म था हस्ती मेरी, मेरे अपने लूटेंगे,
राज़ कहाँ अब राज़ रहे जो, उनको हमराज़ बना बैठा.

कौन सुनेगा मेरी अब और, कौन करेगा मुझ पे यकीन,
जिसकी खातिर था जुर्म किया, उसको आवाज़ बना बैठा.

क्यूँ चुभन सी होती है मुझको, खुद अपने ही अरमानो में,
जो था कांटो से भरा हुआ, मैं उसको ताज बना बैठा.

मौत ही मंजिल जिसकी है और, चलना भी जिसपे ज़रूरी है,
मैं खुद ही अपने हाथो से, वो राहें आज बना बैठा.
देख तिजारत चाहत की, सांस थमी है यारी की.
कैसे समझाऊ तुझको, क्या हालत है दिलदारी की.

आज बाज़ार-ए-इश्क लगा है, कितने खरीदार आये हैं,
ऐसे आलम में अब दिल में, जगह कहाँ खुद्दारी की.

जब तक मेरे पास था वो, हर शय पे मेरा राज रहा,
अब मुफलिस सा पर भटक रहा हूँ, संगत है बेकारी की.

ना चैन से जीने देती है, ना जान ही मेरी लेती है,
तू ही बता दे मुझको बशर, क्या अदा है ये बीमारी की.

उनके नशे में आलम अपना, खुद ही बेगाना कर बैठा,
अब डरता हूँ अपनों से भी, और चाहत नहीं खुमारी की.

नज़र परेशाँ धड़कन हैराँ, लहू रगों का तड़पा है,
दौड़ता हूँ सायों के पीछे, ये हालत है बेजारी की.

गर सोने दे मुझको वो तो, ज़मीन के नीचे सो जाऊं,
कि अब ना साँसे कटती हैं, बेहया सी इस इंतज़ारी की.

Sunday, January 11, 2009

तेरे रुखसार की कीमत, चुकाऊंगा सनम मैं फिर,
मोहब्बत में तेरी ये सर, झुकाउंगा सनम मैं फिर

कैसी
की शरारत तूने, मेरे दिल से पिछली रात,
भरी महफिल में यारो को, बताऊंगा सनम मैं फिर

मैंने जब वार दी खुशियाँ, सभी तेरी मोहब्बत पे,
तो क्यूँ उन खुशियों पे अब हक, जताऊंगा सनम मैं फिर

ये मेरा ज़ख्म--दिल है आखिरी, बस दीद तू कर ले,
तेरी चौखट पे आइन्दा, ना आऊंगा सनम मैं फिर

मेरी रुसवाई देती है, तुझे अब वास्ता सुन ले,
ना मेरी इल्तेज़ा तुझको,
सुनाऊंगा सनम मैं फिर

पशेमान ना रहे तू भी, गिला मुझको भी ना फिर हो,
चला जाऊंगा ना तुझको, रुलाऊंगा सनम मैं फिर