Saturday, January 30, 2010

तू जिसे मिल जाए ...

तू जिसे मिल जाए वो, क्यूँ भला गमगीन हो,
क्यूँ उसे ना नाज़ हो, क्यूँ ना वो खुदबीन हो.

तेरे होंठो की ये जुम्बिश, क़ातिलाना है बड़ी,
गर नज़र उठ जाए तेरी, जाम हर रंगीन हो.

है मुझे मंज़ूर तोहमत, तू अगर दे इश्क की,
औ मौत भी मंज़ूर है गर, ये खता संगीन हो.

वो नहीं आये मेरा दिल, खुश भला कैसे रहे.
कैसे मेरी बाम-ओ-शब, तेरे बिना हसीन हो.

माफ़ कर दे ए खुदा, मैं कर ना पाऊं बन्दगी,
तुझसे बेहतर तो मुझे, दीद-ए-माहज़बीन हो.

दर्द इक होता है दिल में, फुरक़तों की बात पे,
आ मिटा दे इसको, इससे पहले ये पेशीन हो.

लो संभालो दिल मेरा, देखो ज़रा इसे तोड़कर,
सुन रखा है मैंने, तुम इस खेल के शौकीन हो.

इंकार गर हो इश्क से, कुचल देना मुश्क इक,
खामोश लब आदि रहें, न इश्क की तौहीन हो.


[ Khudbeen - Proud ]
[ Pesheen - Old ]

Tuesday, January 19, 2010

क्या कहिये ...


हुस्न क़यामत नज़र क़यामत अदा क़यामत क्या कहिये,
ये जलवे यूँ भी कम ना थे उस पे ये नजाकत क्या कहिये.

मैं काफ़िर था पर मुझको पुजारी बना गई उल्फत उनकी,
अब मुर्दा अरमाँ जीने लगे हैं उनकी इनायत क्या कहिये.

बस उनकी इक मुस्कान पे यारों वार दूँ अपनी हस्ती मैं,
अपनी ही जाँ से कर बैठा ये कैसी खिलाफत क्या कहिये.

नश्तर उनके दस्त में देखा फिर भी सर झुकता ही गया,
शिकवा हम तो कर न सकेंगे रस्म-ए-चाहत क्या कहिये.

ये अर्श के आँसूं दिखे बशर को नाम हँसीं शबनम बख्शा,
और अश्क मेरे मंज़ूर नहीं, क्यूँ आई हरारत क्या कहिये.

यूँ सामने आकर नज़र मिलाकर वो पल्लू दबाये दाँतों में,
दिल न सम्भले आरज़ू पिघले मेरी हिमाक़त क्या कहिये.

खिड़की पर आना ज़ुल्फ़ सुखाने चलके घुंघरूं वाले पैरों से,
तीर-नज़र के वार से नादाँ दिल की हिफाज़त क्या कहिये.

उनकी ही गली में जो रोज़ ही 'आदि' तकते हैं राहें उनकी,
वो इश्क के हमको हश्र बताएं उनकी हिमायत क्या कहिये.

Monday, January 18, 2010

कुछ ऐसा कमाल हो ...


काश इस बार की होली में कुछ ऐसा कमाल हो,
आसमाँ की सुर्खी का सबब प्यार औ' गुलाल हो.

बहुत बार सुने हैं मैंने ख़ुशी में मातम के नगमे,
चाहता हूँ साज़ पर इस दफा दीप-राग बहाल हो.

जज़्बा वो पैदा कर मेरे खुदा देश की आवाम में,
रहीम राम को पुकारे औ क़ाज़ी को न मलाल हो.

कुछ इस तरह से काँधे मिला दें आज अपनों से,
कि आँखों से अश्क बहें तो हाथ अपना रुमाल हो.

महज़ प्यार की ज़ुबान ही पढाई जाए मदरसों में,
और पर्चा-ए-तालीम में सिर्फ प्यार का सवाल हो.

रिश्तों के मसले मिटाना सीखें सभी मोहब्बत से,
भाई-भाई के बीच ए ख़ुदा ख़ंजर ना इस्तमाल हो.

कुछ ऐसे सजाओ अपने गुलशन-ए-हिंद को यारो,
जब भी अमन की बातें हों अपना हिंद मिसाल हो.

ख़ुदा के दर पे आज फिर 'आदि' है चलकर आया,
चढ़ते सूरज के संग मेरे हिंद का बुलंद इक़बाल हो.


[ Iqbaal - Fortune, Prosperity ]

Monday, January 11, 2010

आरज़ू हो जाऊँ मैं तेरी ...

यार से शिकवा हो कैसा, खुद से शिकायत है हमको,
जान से भी प्यारी यारो, उनकी ये नज़ाक़त है हमको.

वो सुर्ख नज़र वो अंगड़ाई, उस पर वो लब अंगारों से,
इक दीद की कीमत ऐसी क्या, आई हरारत है हमको.

खुद बहका सा फिरता है जो, पीके उनकी ही नज़रों से,
बज़्म में आके आज वही, सिखलाए शराफत है हमको.

कौन मरा है किसकी ख़ातिर, कब्र की ताबिश से पूछो,
उस क़ातिल का नाम न लें हम, ऐसी हिदायत है हमको.

अए मेरे तसव्वुर जाग ज़रा, खूँ को ए कलम रवानी दे,
वो पढ़के समायें बाहों में, लिखनी वो इबारत है हमको.

नज़र से यूँ होके गुजरूँ कि, करलूँ ठिकाना दिल में ही,
आरज़ू हो जाऊँ मैं तेरी, क्या इतनी इजाज़त है हमको.

ए ख़ुदा अगर कर पाए तो, 'आदि' पे एहसाँ इतना कर,
महबूब ख़ुदा हो जाए उसी की, करनी इबादत है हमको.