Wednesday, October 21, 2009

शिकायत ...

हम-कदम बनके कौन, साथ देता है ज़माने में,
क्या लगता है किसी का, मुझ पे यूँ मुस्कुराने में.

अभी तक प्यास बाकी है, गला तर तो है अश्कों से,
महज़ दो कतरा ही उल्फत, तलाशी हर पैमाने में.

कि इस बार सावन से, गुजारिश की थी बहारों की,
खिज़ा का बस मगर डेरा, हुआ इस आशियाने में.

मेरी ही बज़्म में आके, शिकायत मेरी ही करना,
उन्हें क्या लुत्फ़ आता है, हमें यूँ आज़माने में.

कभी मेरे खयालो में, कभी अरमानों में वो हैं,
हमेशा जीते क्यूँ हैं वो, मेरे हर इक फ़साने में.

मरीज़--इश्क बन बैठे, बुलाना क्या हकीमों को,
हमें आराम मिलता है, उन्हीं का गम सजाने में.

उन्हीं की याद में रोकर, बताना आँख में तिनका,
ज़रा देखो अभी तक वो, जवाँ हैं हर बहाने में.

2 comments:

  1. Very nice & buetiful gazals...
    i really impressed.
    i like all these.

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  2. की इक बार सावन से , गुजारिश की थी बहारों की
    खिज़ा का बस मगर डेरा , हुआ इस आशियाने में

    वाह ....आदित्य जी लाजवाब.......!!

    मेरी ही बज़्म में आके , शिकायत मेरी ही करना
    उन्हें क्या लुफ्त आता है , हमें यूँ आजमाने में .....

    सुभानाल्लाह .....बहुत खूब लिखते हैं आप .....!!

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