Monday, October 12, 2009

तुझे अब भुला दूँ मैं

ये वाजिब है सनम, तुझे अब भुला दूँ मैं,
मेरे दिल के, हर कोने से, तुझे गला दूँ मैं.

क्यूँ तेरी राह में आऊं, क्यूँ तेरी दीद करूँ,
ना-मुनासिब है, बेसबब तुझे, यूँ रुला दूँ मैं.

खतों में सयाही की जगह, खूँ की खुश्बू है,
चमन लुट गया, अब ख़तों को भी, जला दूँ मैं.

मेरी स्याह रातें कुछ, बेहरारत आज कल हैं,
तेरे हिज्र की, जुम्बिश से, ज़रा हिला दूँ मैं.

क्यूँ अरमाँ आज भी, जागे हैं तेरी खातिर,
खुद को मिटाऊं खुदा, या, इन्हें ही सुला दूँ मैं.

ज़िन्दगी दुश्वार, मौत भी, आती नहीं दिखती,
इश्क की नेमत से इसे, चलो, आज मिला दूँ मैं.

'आदि' को, गिरा दे नज़र से, इल्तजा सुन ले,
फिर मैं, तुझपे नाज़ करूँ, तुझे ये सिला दूँ मैं.

2 comments:

  1. bahut khubsurat likha hai bhai......
    mazaa aa gaya....superb.

    keep sharing!!

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