Tuesday, October 13, 2009

अभिलाषा ...

बीहड़ मन में राह सुगम सी, रोज़ बनाती अभिलाषा.
नया पुष्प इक नई आशा का, रोज़ खिलाती अभिलाषा.

अंतर्मन के भाव बहें जब, पलकों से अश्रू बनके,
केश घने हर इक पीड़ा के, रोज़ सहलाती अभिलाषा.

लगता है जब कठिन राह है, मग कंकड़ से अटा पड़ा,
रथ बनके संबल का मुझको, रोज़ घुमाती अभिलाषा.

सागर सा लगता जब मुझको, विकट कर्म कोई अपना,
मेरी सफलता की वो कहानी, रोज़ सुनाती अभिलाषा.

पीछे हटा कभी आगे बढा, रुद्ध मिला कभी मार्ग मुझे,
हाथ पकड़ के आगे चलना, रोज़ सिखाती अभिलाषा.

जब मेरा विश्वास डिगा जब, परछाई भी छोड़ गई,
तिमिर ये मेरा अपनी लौ से, रोज़ मिटाती अभिलाषा.

झंझावात जब सत्-असत्य के, घेर मुझे कभी लेते हैं,
आत्म-विवेचन की शैली से, रोज़ मिलाती अभिलाषा.

व्यर्थ प्रपंचों में फंसकर जब, अच्छा-बुरा 'आदि' भूला,
नई परिभाषा नए मानव की, रोज़ बताती अभिलाषा.

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