Thursday, October 8, 2009

एक शिकायत ...

जो तूने मेरा दामन, थाम के, न छोड़ा होता,
मुझे दर्द तो होता, मरने का, मगर थोड़ा होता।

जब बिखरा मेरा दिल तो, पछता रहा हूँ मैं,
अपनी साँस को, धड़कन से तो न, जोड़ा होता।

मंजिल-ए-इश्क थी, चंद कदमो पर हमसफ़र,
जो क़ज़ा ने अपनी राहो को, ऐसे न मोड़ा होता।

मैं भी खुश रहता जहाँ में, तुम्हारी तरह बशर,
जो ओढ़ता दोहरा नक़ाब, सीना भी चौड़ा होता।

चैन आ जाता मुझे भी, ख्वाब-ए-सुकूँ आने पर,
मोहब्बत ने अगर, बिस्तर पे, न झिंझोड़ा होता।

मैं भी इन्सान हूँ, जीने की है, तमन्ना मुझ में,
नाज़ुक लम्हों को, पत्थर से तो न, तोड़ा होता।

2 comments:

  1. KHubsurat likha hai bhai.....bas yu hi likhte raho.

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  2. Adi aapki iss gazal me jo dard hai, wo mujhe mahsoos hua. ye gazal mujhe bahut zyada achchi lagi.

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