Saturday, June 19, 2010

बख्शे हैं ...

दर कदम वक़्त ने सीरत पे ज़खम बख्शे हैं,
ज़मीं-ए-ख़ार मुझको, उनको हरम बख्शे हैं.

मेरी नज़रों से, टपकता है, इश्क हर लम्हा,
दिवार-ए-दिल पे स्याह धब्बे, नम बख्शे हैं.

हम-शबिस्ताँ हैं आजकल, महज़ यादें तेरी,
मेरे ख़्वाबों ने मुझे, वस्ल के भरम बख्शे हैं.

कोई न कुछ मांगेगा यारों से अब ज़माने में,
मेरी ख्वाहिश पे मुझे उसने यूँ गम बख्शे हैं.

हो क्या सैयाद से शिकवा औ गिला तीरों से,
जब बागबाँ ने ही, साँसों पर ज़ुलम बख्शे हैं.

न जिन्हें आहों की परवाह, न फिक्र दर्दों की,
वाह ख़ुदा तूने क्या संगदिल सनम बख्शे हैं.

तेरी गलियों में बस इक सदा ही देगा आदि',
मेरी साँसों ने, लम्हात-ए-सब्र कम बख्शे हैं.

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