Sunday, June 20, 2010

तेरी तस्वीर ...

हथेली पर तेरा ही नाम, लिखता हूँ मिटाता हूँ,
तेरी तस्वीर इस दिल में, हर दम ही बनाता हूँ.

बड़ा खुश होता है वो पल, जब ये बात होती है,
तुझे ही लिखके पन्नों पे, तुझको ही सुनाता हूँ.

मुझे ये दाद मिलती है, करम इसमें भी है तेरा,
महफ़िल झूम उठती है, तुझे जब गुनगुनाता हूँ.

रूठा जब भी तू मुझ से, सुकूँ से जी नहीं पाया,
हंसा दे इक दफ़ा तुझ को, ख़ुदाई को मनाता हूँ.

ना जाने तुम ही क्यूँ, आते नहीं हो रू ब रू मेरे,
ज़माना रोता है सारा, मैं तुम को जब बुलाता हूँ.

मुतमव्विल हूँ कि मुफ़लिस हूँ, ये जानता हूँ मैं,
करके दिल के ये सौदे, मैं बस अरमाँ कमाता हूँ.

'आदि' और क्या अंजाम होगा, तेरा उल्फत में,
शब- ए-हिज्राँ में रोता हूँ, वस्ल पे मुस्कुराता हूँ.

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