Saturday, June 19, 2010

मेरी तन्हाई ...

शब बसर होती है लेकिन, मेरी तन्हाई नहीं,
रु-ब-रु आ कि तूने, मेरी चाह आजमाई नहीं.

इन मेरी आँखों से, मेरा खून जब बहा न हो,
इश्क के बाद ऐसी ज़िंदगी, अभी बिताई नहीं.

ज़माने से कहा कि उसने कुछ बताया न मुझे,
मौत से पहले क्या, दास्तान मैंने सुनाई नहीं.

मैं मगर खुश हूँ अब हिज्र-ए-इश्क में क्यूंकि,
हुआ है इल्म मेरा हासिल उनकी रानाई नहीं.

सिल लिए होंठ ये जब, बज़्म में आये थे तुम,
इश्क ब-इज्ज़त चाहिए, तुम्हारी रुस्वाई नहीं.

क़ीमत इश्क की लगाना ज़माने का हुनर होगा,
तिजारत ये होगी नहीं हमसे, हम सौदाई नहीं.

गुनाह-ए-इश्क में मंज़ूर है, सज़ा-ए-मौत हमें,
झुका दरबार में सिर 'आदि', देगा सफाई नहीं.

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