Saturday, January 30, 2010

तू जिसे मिल जाए ...

तू जिसे मिल जाए वो, क्यूँ भला गमगीन हो,
क्यूँ उसे ना नाज़ हो, क्यूँ ना वो खुदबीन हो.

तेरे होंठो की ये जुम्बिश, क़ातिलाना है बड़ी,
गर नज़र उठ जाए तेरी, जाम हर रंगीन हो.

है मुझे मंज़ूर तोहमत, तू अगर दे इश्क की,
औ मौत भी मंज़ूर है गर, ये खता संगीन हो.

वो नहीं आये मेरा दिल, खुश भला कैसे रहे.
कैसे मेरी बाम-ओ-शब, तेरे बिना हसीन हो.

माफ़ कर दे ए खुदा, मैं कर ना पाऊं बन्दगी,
तुझसे बेहतर तो मुझे, दीद-ए-माहज़बीन हो.

दर्द इक होता है दिल में, फुरक़तों की बात पे,
आ मिटा दे इसको, इससे पहले ये पेशीन हो.

लो संभालो दिल मेरा, देखो ज़रा इसे तोड़कर,
सुन रखा है मैंने, तुम इस खेल के शौकीन हो.

इंकार गर हो इश्क से, कुचल देना मुश्क इक,
खामोश लब आदि रहें, न इश्क की तौहीन हो.


[ Khudbeen - Proud ]
[ Pesheen - Old ]

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