Tuesday, February 9, 2010

उल्फ़त दे मुझको ...


रुकने की ज़िद ना कर, अब रुखसत दे मुझको,
अगर हो सके तो बस अपनी, हसरत दे मुझको.

मेरे हिस्से में फ़क्त खंडहर हैं, ज़रा देख तो सही,
तू अपनी मोहब्बत की, सीली सी छत दे मुझको.

बड़ी मुश्किल से छूटा हूँ, साक़ी तेरे मयखाने से,
यूँ न देख अब मुझे, न दीदार की लत दे मुझको.

देखते ही ये लोग सताते हैं, तेरा नाम लेके मुझे,
खुद को ही भूल जाऊं, ऐसी वो उल्फ़त दे मुझको.

तुझे देख के भी अज़ल से, न मूँ फेर सकूँ अपना,
मैय्यत सजने से पहले, इतनी ताक़त दे मुझको.

वस्ल का न सही, फुरक़त का ही बयाँ हो जिसमें,
अपनी जफ़ा से सजा तू, कोई तो ख़त दे मुझको.

'आदि' दुश्मन रहे तेरा, तो भी कोई शिकवा नहीं,
तेरा गुनाहगार रहूँ ता-उम्र, ये इजाज़त दे मुझको.

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