Tuesday, January 19, 2010

क्या कहिये ...


हुस्न क़यामत नज़र क़यामत अदा क़यामत क्या कहिये,
ये जलवे यूँ भी कम ना थे उस पे ये नजाकत क्या कहिये.

मैं काफ़िर था पर मुझको पुजारी बना गई उल्फत उनकी,
अब मुर्दा अरमाँ जीने लगे हैं उनकी इनायत क्या कहिये.

बस उनकी इक मुस्कान पे यारों वार दूँ अपनी हस्ती मैं,
अपनी ही जाँ से कर बैठा ये कैसी खिलाफत क्या कहिये.

नश्तर उनके दस्त में देखा फिर भी सर झुकता ही गया,
शिकवा हम तो कर न सकेंगे रस्म-ए-चाहत क्या कहिये.

ये अर्श के आँसूं दिखे बशर को नाम हँसीं शबनम बख्शा,
और अश्क मेरे मंज़ूर नहीं, क्यूँ आई हरारत क्या कहिये.

यूँ सामने आकर नज़र मिलाकर वो पल्लू दबाये दाँतों में,
दिल न सम्भले आरज़ू पिघले मेरी हिमाक़त क्या कहिये.

खिड़की पर आना ज़ुल्फ़ सुखाने चलके घुंघरूं वाले पैरों से,
तीर-नज़र के वार से नादाँ दिल की हिफाज़त क्या कहिये.

उनकी ही गली में जो रोज़ ही 'आदि' तकते हैं राहें उनकी,
वो इश्क के हमको हश्र बताएं उनकी हिमायत क्या कहिये.

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