Monday, September 20, 2010

ग़ज़ल लिख कर ...


ग़ज़ल लिख कर, अपने ग़म दबा लेता था,

ख़यालों की गली से, तुझको बुला लेता था.

कुछ ख्वाब बेचैन होकर, खरोचते थे नज़र,
संग अरमानों के, उनको मैं, सुला लेता था.

वक़्त के पास, यूँ तो न था, कुछ मेरे लिए,
लम्हात-ए-इश्क फिर भी मैं, चुरा लेता था.

कि वक़्त'ए क़ज़ा में, शोर मेरा दिल न करे,
लिहाज़ा, याद में यूँ दौड़ा के, थका लेता था.

अजीब मैं हूँ या अजीब है ये इश्क की रस्में,
जो सितम सहने को, सर मैं झुका लेता था.

गज़ब हुनर है ग़ज़ल में ये सभी की होती है,
वो हो लेते थे खुश औ' मैं ग़म सुना लेता था.

Monday, August 2, 2010

चेहरा नया समझे ...

बची हैं आरज़ू कितनी, उसे क्या ये क़ज़ा समझे,
जो आहट वक़्त ने की थी, उसे तेरी सदा समझे.

कभी जिसने सनम की, रूबरू ही दीद ना की हो,
शब का वो कहर समझे, ख़्वाबों का मज़ा समझे.

नहीं कुछ और गम मुझको, फक्त, एक ये गम है,
कभी तो, वो मुझे समझे, कभी मेरी वफ़ा समझे.

नशेमन पर मेरे चाहत, गिरी है वर्क इक बनकर,
पशेमाँ सोचते हैं, इश्क को हम, क्यूँ खुदा समझे.

वही गम फिर से आके, है बसा गोशा-ए-दिल में,
तुझे पाके जिसको हम, कभी खुद से जुदा समझे.

हम तो थे वही लेकिन, नहीं था हमने गम ओढ़ा,
हम में था, हुसूल-ए-इश्क, वो चेहरा नया समझे.

खुदा से माँगा 'आदि ने, इबादत में सनम तुमको,
दुआ में, नाम जो आया, उसको तुम खता समझे.


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[ Husool - Realisation ]

Wednesday, July 14, 2010

दीवार नहीं हम ...

तेरी ख्वाहिशों के दरमियाँ, दीवार नहीं हम,
पर ऐसा नहीं कि बिन तेरे, बेज़ार नहीं हम.

खुद से करें शिकवा, कि मिल सके न तुम,
या तेरी ही लकीरों का, इख़्तियार नहीं हम.

अग़र मिलने आ सको तो आना शिताब से,
कि रुख्सत के दौराँ करते इंतज़ार नहीं हम.

नशेमन पे आ गिरा मेरे शोला-ए-बर्क इक,
ज़ीनत के जहाँ में करेंगे, यूँ दयार नहीं हम.

इक बर्ग-ए-दरख़्त हैं हम जो टूटा शाख से,
नाता नहीं सबा से, औ' पुर-बहार नहीं हम.

बन जाते हम-क़दम, तेरे हर सफ़र में हम,
ख़िराम तुम न रह सके, बरफ़्तार नहीं हम.

'आदि' बेमेल राब्ता था जो अंजाम ये हुआ,
तुम क्यूँ हुए पशेमाँ जब, शर्मसार नहीं हम.


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Tuesday, July 13, 2010

आशिकों को काम क्या ...

इश्क के मैदाँ में, दूजा, आशिकों को काम क्या,
जंग अपने दिल से है आगाज़ क्या अंजाम क्या.

हुस्न की गलियों से गिले, आज फिर बहने लगे,
मयकशों को फर्क क्या, नाम क्या बदनाम क्या.

रुखसार की, इक दीद पर, दिल बिछा देते हैं वो,
सब फ़िदा तुमपे हुए, ख़ास क्या और आम क्या.

हर आरज़ू भी टूटती है, बिस्तर पे ले के करवटें,
फुरक़तों के दरमियाँ हो, चैन क्या, आराम क्या.

उनकी जुल्फें उनकी रंगत, है इस क़दर हावी हुई,
भूल बैठे हम अदम, है रात क्या, औ' बाम क्या.

हम झुका के नज़र जाना, हर सितम सह जायेंगे,
तौहीन जलवों की करे कमज़र्फ है ये गुलाम क्या.

जब देख लेते हैं तुम्हें तब, पैमाँ देती है ज़िन्दगी,
तुम जुदा होते हो, आती मौत है ये इंतज़ाम क्या.

'आदि' की ही है खता जो, मर मिटा है तुमपे ये,
नज़र तेरी तेरा जलवा, हम दें तुझे इल्ज़ाम क्या.


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