Tuesday, July 13, 2010

आशिकों को काम क्या ...

इश्क के मैदाँ में, दूजा, आशिकों को काम क्या,
जंग अपने दिल से है आगाज़ क्या अंजाम क्या.

हुस्न की गलियों से गिले, आज फिर बहने लगे,
मयकशों को फर्क क्या, नाम क्या बदनाम क्या.

रुखसार की, इक दीद पर, दिल बिछा देते हैं वो,
सब फ़िदा तुमपे हुए, ख़ास क्या और आम क्या.

हर आरज़ू भी टूटती है, बिस्तर पे ले के करवटें,
फुरक़तों के दरमियाँ हो, चैन क्या, आराम क्या.

उनकी जुल्फें उनकी रंगत, है इस क़दर हावी हुई,
भूल बैठे हम अदम, है रात क्या, औ' बाम क्या.

हम झुका के नज़र जाना, हर सितम सह जायेंगे,
तौहीन जलवों की करे कमज़र्फ है ये गुलाम क्या.

जब देख लेते हैं तुम्हें तब, पैमाँ देती है ज़िन्दगी,
तुम जुदा होते हो, आती मौत है ये इंतज़ाम क्या.

'आदि' की ही है खता जो, मर मिटा है तुमपे ये,
नज़र तेरी तेरा जलवा, हम दें तुझे इल्ज़ाम क्या.


[ Aagaz - Beginning ]
[ Baam - Morning ]
[ Paimaan - Confirmation ]

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