Saturday, July 2, 2011

जब ख़याल आया ...


फ़ना हुई हस्ती का, जब ख़याल आया,
और कुछ नहीं ज़रा सा, मलाल आया.

क्यूँ की पैरवी ग़मों की, अपने खिलाफ,
वक़्त-ए-रुख्सत, ज़हन में सवाल आया.

हँसते लब उन्हें कभी, पसंद नहीं आये,
औ' अश्कों का, हमें न इस्तमाल आया.

बेवफा नाम सही, याद तो किया उसने,
लबों पे उसके, ये ज़िक्र बहरहाल आया.

नाखुदा होके समंदर में, छोड़ दी कश्ती,
या खुदा रहम उसे, हमपे बेमिसाल आया.

ख़याल-ए-हिज्र से ही, सिहर जाता था,
आज वो रूबरू, करने को हलाल आया.

चाहकर भी जो मैं, रोक न सका खुदको,
वल्लाह हुस्न तेरा, तुझपे जमाल आया.

खिज़ा-ओ-वर्क है आदि, और वीराना है,
किस अदा से चमन में, नया साल आया.




[ Malaal - Grief ] [ Pairavi - Taking side of ]
[ Rukhsat - Dismissal | Zehan - Mind ]
[ BaharHaal - In Any case ] [ Nakhuda - Boatman ]
[ Hijra - Separation ] [ Jamaal - Beauty ]
[ Khiza - Autumn | Warq - Lightning ]

4 comments:

  1. हंसते लब उन्हें कभी, पसंद नहीं आये
    औ' अश्कों का, हमें न इस्तमाल आया


    क्या बात है ! बहुत ख़ूबसूरत शे'र है …

    पूरी रचना के लिए मुबारकबाद स्वीकार करें आदित्य जी


    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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