Thursday, July 14, 2011

समंदर नहीं हैं हम ...



माना तेरी निगाह का, मंज़र नहीं हैं हम,

गम ही मकाँ सही पर, बेघर नहीं हैं हम.

तेरे इकरार पे खिले थे, मुश्क-ए-आरज़ू,
इनको रोक पाते कैसे, बंजर नहीं हैं हम.

थोड़ी रौशनी पाके, हम भी संवर जायेंगे,
दयार-ए-वफ़ा हैं कि, खंडहर नहीं हैं हम.

साहिल बिखर गए हैं, सैलाब'ए-हिज्र में,
अदना सा दरिया हैं, समंदर नहीं हैं हम.

दिल्लगी छोड़ो, बताओ सूरत'ए-इकरार,
ग़ज़लें लिखें कब तक, शायर नहीं हैं हम.

इक तो जुदाई तेरी, उसपे यादें ये बेरहम,
यूँ फूटके, रोते वरना, अक्सर नहीं हैं हम.

आदि' संभाल लेते, शर्त'ए-शय'ओ-मात,
पर गुलाम-ए-वक़्त, सिकंदर नहीं हैं हम.




[ Manzar : Scene ] [ Maqaan : Residence ]
[ Iqraar : Declaration ] [ Mushq : Flower ]
[ Dayar : Residence ] [ Saahil : Shore ]
[ Sailaab : Flood ] [ Hijra : Separation ]
[ Surat-e-Iqraar : Condition for Declaration ]
[ Shart-e-Shay-o-Maat : Conditions of Victory and Defeat ]

4 comments:

  1. आज 15- 07- 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


    ...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
    ____________________________________

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  2. vah keya likha hai
    kave ke kiya kahne

    आप का बलाँग मूझे पढ कर अच्छा लगा , मैं भी एक बलाँग खोली हू
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

    आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

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