Friday, February 12, 2010

वफ़ा मांगते हो ...


उजड़े चमन से बहारों की, सबा मांगते हो,
बरबाद मोहब्बत से, हुस्न नया मांगते हो.

बोली लगा के दिल की, सौदा-ए-इश्क में,
पेशा-ए-आशिक़ी से, तुम नफा मांगते हो.

रुखसार की सुर्ख़ी से, जो चाक़ करे सीना,
तुम उन की अदा से, यारों हया मांगते हो.

जब भी वो देखता है, ले लेता है मेरी जाँ,
तुम उससे ही मेरे मर्ज़ की, दवा मांगते हो.

साहिल बदल दिया, मुझे तूफाँ मैं देख के,
तुम ऐसे नाखुदाओं से, क्यूँ वफ़ा मांगते हो.

क्या जी सकूँगा अब मैं, उनके बिना बशर,
क्यूँ लम्बी उम्र की मेरी, यूँ दुआ मांगते हो.

उनसे जुदा हुआ तो, क्या लिख सकूँगा मैं,
मेरी कलम के वास्ते, क्यूँ ज़िया मांगते हो.

जो हुनर 'आदि' होता, वो हासिल हमें होते,
नाकाम परिंदे से, उड़ने की, अदा मांगते हो.




[ Sabaa - Breeze ]
[ Ziyaa - Brilliancy/Shine ]

2 comments:

  1. बहुत खूबसूरत
    और एक खास बात इस गज़ल की
    सभी लाइनों की लम्बाई बिलकुल बराबर रही है

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  2. bahut khoosburat maqta ........ nakaam parinde se ............

    bahut achcha laga

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