Tuesday, September 28, 2010

सबब इंतज़ार का...


कोई तो मुझको बताये, सबब अब इंतज़ार का,
मर्ज़ क्या है क्या दवा, अब दिल-ए-बीमार का.

जान रुख़सत हो रही है, क्यूँ मेरी हर साँस से,
हासिल-ए-चाहत है ये, या सितम है प्यार का.

जोड़कर ज़र्रों को हमने, इक नशेमन था किया,
उसको बिखरा देख, दिल ये, रो रहा बेजार का.

इस कब्र से बहती सदायें, कोई तो सुनले बशर,
मेरी हर इक आह है बस, फ़लसफा, इंकार का.

रोऊँ मैं या रोये तू ये हैं, नेमतें उल्फत की बस,
इस बात पे अब बता क्या, सबब है तकरार का.

बीते लम्हों से रहा ना, कोई शिकवा अब सनम,
कुछ नहीं है, वो महज़ हैं, सोज़ उस इकरार का.

क्यूँ ये तराना दूर से, आता हुआ, अपना सा है,
अब छेड़ता है कौन, 'आदि', साज़ मेरे प्यार का.





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Monday, September 20, 2010

ग़ज़ल लिख कर ...


ग़ज़ल लिख कर, अपने ग़म दबा लेता था,

ख़यालों की गली से, तुझको बुला लेता था.

कुछ ख्वाब बेचैन होकर, खरोचते थे नज़र,
संग अरमानों के, उनको मैं, सुला लेता था.

वक़्त के पास, यूँ तो न था, कुछ मेरे लिए,
लम्हात-ए-इश्क फिर भी मैं, चुरा लेता था.

कि वक़्त'ए क़ज़ा में, शोर मेरा दिल न करे,
लिहाज़ा, याद में यूँ दौड़ा के, थका लेता था.

अजीब मैं हूँ या अजीब है ये इश्क की रस्में,
जो सितम सहने को, सर मैं झुका लेता था.

गज़ब हुनर है ग़ज़ल में ये सभी की होती है,
वो हो लेते थे खुश औ' मैं ग़म सुना लेता था.

Monday, August 2, 2010

चेहरा नया समझे ...

बची हैं आरज़ू कितनी, उसे क्या ये क़ज़ा समझे,
जो आहट वक़्त ने की थी, उसे तेरी सदा समझे.

कभी जिसने सनम की, रूबरू ही दीद ना की हो,
शब का वो कहर समझे, ख़्वाबों का मज़ा समझे.

नहीं कुछ और गम मुझको, फक्त, एक ये गम है,
कभी तो, वो मुझे समझे, कभी मेरी वफ़ा समझे.

नशेमन पर मेरे चाहत, गिरी है वर्क इक बनकर,
पशेमाँ सोचते हैं, इश्क को हम, क्यूँ खुदा समझे.

वही गम फिर से आके, है बसा गोशा-ए-दिल में,
तुझे पाके जिसको हम, कभी खुद से जुदा समझे.

हम तो थे वही लेकिन, नहीं था हमने गम ओढ़ा,
हम में था, हुसूल-ए-इश्क, वो चेहरा नया समझे.

खुदा से माँगा 'आदि ने, इबादत में सनम तुमको,
दुआ में, नाम जो आया, उसको तुम खता समझे.


[ Gosha - Corner ]
[ Husool - Realisation ]

Wednesday, July 14, 2010

दीवार नहीं हम ...

तेरी ख्वाहिशों के दरमियाँ, दीवार नहीं हम,
पर ऐसा नहीं कि बिन तेरे, बेज़ार नहीं हम.

खुद से करें शिकवा, कि मिल सके न तुम,
या तेरी ही लकीरों का, इख़्तियार नहीं हम.

अग़र मिलने आ सको तो आना शिताब से,
कि रुख्सत के दौराँ करते इंतज़ार नहीं हम.

नशेमन पे आ गिरा मेरे शोला-ए-बर्क इक,
ज़ीनत के जहाँ में करेंगे, यूँ दयार नहीं हम.

इक बर्ग-ए-दरख़्त हैं हम जो टूटा शाख से,
नाता नहीं सबा से, औ' पुर-बहार नहीं हम.

बन जाते हम-क़दम, तेरे हर सफ़र में हम,
ख़िराम तुम न रह सके, बरफ़्तार नहीं हम.

'आदि' बेमेल राब्ता था जो अंजाम ये हुआ,
तुम क्यूँ हुए पशेमाँ जब, शर्मसार नहीं हम.


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