
मुन्तजिर हू मैं शराब-ए-इश्क का साकी मेरे,
नज़र से ऐसी पिला दे होश में न मैं रहू.
बुत है कहता कोई तुझको कोई कहता है खुदा,
मेरे दिल का तू खुदा है तुझे जिंदगी क्यूँ ना कहू।
आजा मेरे रू-ब-रू तेरी दीद पे मर जाऊ मैं,
जो ना देखू तुझको मैं फिर जीता यू कैसे रहू।
कह रहा है हर फ़साना राख से उठता धुंआ,
कब तलक इस इश्क से मैं इस कदर जलता रहू।
सजदे करता हूँ खुदा के काश लाये रंग वो,
हर दुआ में पास तू हो मांगता बस ये रहू।
रंग-ओ-बू गुलशन से चलके तेरे रुख तक आए हैं,
है तमन्ना मेरी तेरी जुल्फों में सोता रहू।
क़ैद कर ले मुझको अपने दिल में तू मेरे सनम,
कब तलक में इस जहान में यू भटकता ही रहू.