Wednesday, September 3, 2008

बे-इरादा नज़र...

बे-इरादा नज़र मेरी उनसे जब टकराई थी,
उफ़ क्या थी वो इक क़यामत मेरे दिल पे आई थी,

वो चलें तो सुबह चलती पलकों पे झुकती है शाम,
उनके नूर--हुस्न से ये चांदनी शरमाई थी.

अब्र भी हलचल में अपनी उनके नखरे है लिए,
खूशबू चमन ने भी उनकी साँस से ही पाई थी.

ये ज़मीन उनकी अदा से डोलती है दीवानों सी,
उनकी आँचल की पनाहों से बहारें आई थी.

बस इसी शोखी के रहते दिल मेरा उनका हुआ,
उनके रुख की दीद को ही नज़र फिर लहराई थी.

ये वजूद--दिल में मेरे क्या कसक है छा गई,
ये मोहब्बत उनकी थी या उनकी ये अंगड़ाई थी.

खुशनुमा मौसम है सारा,नज़्म अब है हर जवान,
मेरी ग़ज़ल के साथ उनके दिल की वो शेहनाई थी.

5 comments:

  1. Acchi hai..
    Well done...
    First 2 lines are the best...

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  2. बहुत बढिया लिखा है।

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  3. बहुत खूब लिखा है आप ने ..बधाई ....

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  4. adi kya thoughts hai
    Rocking.
    Keep it up.
    Ur DOst.V_V

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