Thursday, March 11, 2010

जबसे तुम्हें देखा है ...


जबसे तुम्हें देखा है न आराम हुआ है,

तीर-ए-नज़र से दिल का काम हुआ है.

लोग दिवाने हुए तो शिकवा कुछ नहीं,
बहका है दिल तो क्यूँ बदनाम हुआ है.

तेरे जमाल को मैं भला चाँद क्या कहूँ,
असफ़ार बशर का उस पे आम हुआ है.

कोशिशे तो की थी मगर ज़ाया हो गईं,
अब क़ज़ा मुहाल जीना नाकाम हुआ है.

अक्सर वो आते जाते हमें देखते भी हैं,
यूँ उनके शौक़ का हमें अक़दाम हुआ है.

शानों पे गिरती जुल्फें रंगत गुलाब सी,
यूँ सबर आज़माने का इंतज़ाम हुआ है.

है शौक दीद का भी है चाहत पनाह की,
वरना कहाँ 'आदि' कभी गुलाम हुआ है.

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1 comment:

  1. ak bhut hi bahtreen gahzal ka nazara paish kiya hai tumne ..badhai ho ji

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