Sunday, December 20, 2009

ज़माने वाले ...

मोहब्बत को मजाक़ समझते हैं ज़माने वाले,
फिर मुझे क्या खाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

मैं तो बस उल्फत की पैरवी में रहता हूँ यारों,
मेरे अंदाज़ को बेबाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

खुद में पैवस्त किया है उसको इश्क के चलते,
क्यूँ मुझे गिरेबाँ चाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

इन अदाओं से ही जीती बाज़ी--इश्क उसने,
फिर क्यूँ उसे चालाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

हमें तो जीने की अदा सिखा गया इश्क उनका,
नादाँ हैं जो हमें हलाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

मेरी सांस को नव्ज़ों के खूँ को रवानी दी उसने,
तो क्यूँ उसे ख़तरनाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

उनके ही सजदे करते हैं फक्त इक दीद के लिए,
हमारी तरह उन्हें पाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

कि उनकी रुसवाई के डर से दूर हुआ है 'आदि',
ज़ब्त--गम--फ़िराक़ समझते हैं ज़माने वाले.

3 comments:

  1. Bahut khoobasurat rachana---behatareen bhavon kee prastuti.
    HemantKumar

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  2. behad khub... keep it up..aaditya...

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