Monday, December 29, 2008
एक सवाल ...
रगों का खून भी जिसे, पढता है नाम कैसा है.
लोग तो कहते हैं इश्क, जिंदगी देता है मगर,
मैं मिटा क्यूँ हूँ खुदा, ये अंजाम कैसा है.
हर तरफ़ नूर है खुशबु है, उनके हर पल में,
मेरा गुलशन ही क्यूँ वीरान है, आयाम कैसा है.
उनके ही सजदे किए हैं, उनसे ही की है दुआ,
ना जानू मैं क्या करू, खुदा का नाम कैसा है.
लूट कर ख़ुद ही गया है, वो मेरी दुनिया बशर,
खुदा जाने वो मेरे दिल का, जालिम निजाम कैसा है.
उन्हीं को देख के जीना, उन्ही से शिकवे करू,
देख तो आके खुदा उनका, ये गुलाम कैसा है.
दिल देके हमने महज़, दर्द-ओ-गम कमाया है,
मेरी उल्फत का मिला उफ्फ्फ, ये इनाम कैसा है.
जब तलक जीता रहा मैं, उन्ही की ख्वाहिश थी,
देखू तो सही कब्र में ख्वाबो का, इन्तेजाम कैसा है.
(Nizaam-Administrator)
(Ayaam-Day)
(Intezaam-Arrangement)
इल्तेजा ...
रात छत पे जो मैं आऊ, आप आया कीजे।
चार लम्हों की फ़क्त जागीर है, ये जिंदगी मेरी,
रूठकर इसपे सितम यू तो, न ढाया कीजे।
जब भी दिल आए हमारा, तुम्हारी शोखी पर,
रस्म-ए-उल्फत की अदा, आप भी निभाया कीजे।
चार दिन की जिंदगी में, चार पल हैं इश्क के,
इन पालो की आरजू को, यू न ज़ाया कीजे।
जब तलक न दीद होगी चैन आएगा नहीं,
ख्वाबो में आ जाइये, यू न सताया कीजे।
बहुत दीवाने हैं आपके, रुखसार के लेकिन,
हम भी तो आशिक हैं, यू न भुलाया कीजे।
Saturday, December 27, 2008
कुछ खफा खफा सा...
कोने मैं रोता हुआ खुदा, प्यार है मेरा।
इन हसरतों की अब, बातें न करो लोगो,
इन्ही की बदौलत दिल, बेजार है मेरा।
लाख बेदर्द सही पर, कोई बात नहीं,
जैसा भी है वो बस, दिलदार है मेरा।
इन लम्हों से भला यूँ, क्या शिकायत करनी,
वो क्या करें की बस, ये इंतज़ार है मेरा।
वो जफा भी करें, तो भी मंज़ूर मुझे,
मैं उल्फत में रहूँगा, इकरार है मेरा।
देख के उठा लेते हैं, वो ख़ंज़र लेकिन,
उनका दिल भी तो खुदा, गुनहगार है मेरा।
Tuesday, December 23, 2008
आरजू ...
आरजू मिलने की तुझसे, दिन-ब-दिन पलती रही।
बस तड़पते हम रहे, हर रोज़ तेरी याद में,
उम्र भी गुजरी यू ही, और शाम भी ढलती रही।
यू तो था सारा जहाँ, मेरी नज़र के सामने,
एक तू ही ना दिखा, ये बात बस खलती रही।
महफिलों में नज़्म थी, साकी भी था और जाम भी,
फिर भी तेरे हुस्न की ही, बात बस चलती रही।
ज़र्रा होके की तमन्ना, मैंने पाने की चाँद को,
था बड़ा नादान मैं या, ये मेरी गलती रही।
Saturday, December 20, 2008
बेकरारी ...
मर मिटा है उनपे इसकी, करगुजारी देखिये।
दीद जबसे हुई सनम की, तबसे कुछ बहका सा है,
किस कदर छाई है, इस दिल पे खुमारी देखिये।
पत्थरो को भी चीर दे फिर, क्या बिसात-ए-दिल मेरी,
हो नहीं सकती नज़र ये, है ये आरी देखिये।
उनके दर की रहगुज़र में, हो गए कितने फन्ना,
या खुदा आई है अब के, मेरी बारी देखिये।
मरते दम की थी तमन्ना, हमने उनकी दीद की,
नाम में इतना असर था कि, मौत हारी देखिये।
देख के उनको सभी ने, शुरू कर दी बंदगी,
कैसे बनते हैं जहाँ में, अब पुजारी देखिये।
कत्ल होके उनकी नजरो से, बाज़ अब भी ना आये हम,
मौत के साए में कैसे है, इश्क जारी देखिये।
दिल मेरा है चमन सा और, वो लगे सैयाद है,
जिंदगी और मौत की ये, अजब यारी देखिये।
Sunday, December 14, 2008
वतन ..
हमको फिर अपने वतन में,सुकून जिंदा चाहिए।
तोड़ दो दीवारें सारी,ये जहाँ कर लो फतह,
आज हमको फिर वतन के,मफ्तून जिंदा चाहिए।
कह सके दुश्मन से जाके,खून की बातें सभी,
अब दिलो में बस वही,मजमून जिंदा चाहिए।
kaat दे वो हाथ जो,उठ गया है शान पे,
अब वतन को मेरे वो,कानून जिंदा चाहिए।
मर मिटे इज्ज़त की खातिर,काट दे सब बेडियाँ,
वो भगत अशफाक सा फिर,जुनून जिंदा चाहिए।
कॉम हर जीती थी संग संग,जो कभी इस दहर में,
आज फिर इंसान को वो,तवज़ून जिंदा चाहिए।
[Maftoon = Mad in Love]
[Majmoon = Message written in a letter]
[Tavazoon = Balance]
Friday, December 12, 2008
नज़र की राहों से बहते...
ख्वाब दिल जो बुन रहा था,ख्वाब वो उनके रहे।
छोड़ शाखों पे वो कलियाँ,चुन लिए कांटे खुदा,
आलम-ए-मदहोशी में हम,इस कदर उनके रहे।
मेरे बिस्तर पे मिलेगा,और कुछ क्या तुमको अब,
साथ जिनके रात भर था,ख्वाब वो उनके रहे।
खूशबू ने डेरा किया है,कैसे मेरे रूबरू.
गुज़रे हैं वो पास से या,अक्स वो उनके रहे।
लड़खडाए सिर्फ हम या,रिंद भी मदहोश हैं,
ये कसूर-ए-जाम है या,असर ये उनके रहे।
बहुत कोशिश की है मैंने,छूट जाऊ इश्क से,
दिल मगर जिस कैद में है,दस्त वो उनके रहे।
(दस्त = हाथ)
Thursday, November 6, 2008
सितम
टूटा हूँ तो क्या हुआ,मेरा नाम भी मशहूर है।
दिल पिघल कर आज बोला,बहने दे मुझको बशर,
ऐसे मर-मर के धड़कना,अब नहीं मंज़ूर है।
माना महताब-ए-फलक,दूर होता है बाम से,
रौशनी फिर भी है देता,वो नहीं मगरूर है।
संगदिल परदा-नशीं से,क्या करू उम्मीद-ए-रहम,
वो तो अपने हुस्न के,जलवों में ही कुछ चूर है।
सोज़-ए-दिल रह रह के मुझसे,कर रहा है इल्तेजा,
कब्र में सो जाने दे,वहां चैन भी भरपूर है।
खिज़ा आते ही ज्यूँ खुशबू,छोड़ देती है चमन,
मन भरे पे छोड़ देना,हुस्न का भी दस्तूर है।
इश्क हूँ मैं तेरी नज़र से,कैसे करू मुकाबला,
मैं हूँ गर्त-ए-गम-ओ-अँधेरा,तू चमकता नूर है।
Sunday, October 19, 2008
जलवा-ए-यार
मैं कैसे दिल को अपने सीने में लिए फिरता रहूँ ।
तस्वीर
सामने तेरी तस्वीर होती है हम दीदार करते जाते हैं।
Wednesday, October 15, 2008
हुस्न-ओ-इश्क

हुस्न कभी देता नहीं इजाज़त,इश्क को सजाने की,
मर मर के जिया करते हैं वो,जो इश्क किया करते हैं।
गम-ए-तन्हाई को सहने का तरीका देखो,
लहू अश्कों से बहा के,उफ़ तक ना किया करते हैं।
आसुओं से धुलके देखो,कैसा निखरा है दिल मेरा,
खून से लिपटा है और हम,बे-खौफ जिया करते हैं।
उनसे कह दो दे दें हमको,दर्द-ओ-गम जितना भी है,
ये इश्क के नजराने हम हंस हंस के लिया करते हैं।
क्यूँ परेशां इस कदर हैं वो,इश्क की रुसवाई से,
रुस्वाइयाँ आशिक तो यूँ,हर रोज़ पिया करते हैं।
Thursday, October 9, 2008
माँ . . .
दो जहाँ मिलते हैं जिसके कदमो में माँ ही तो है।
माँ के आँचल में पनाहें पाती है हर इक खुशी,
मात को भी शय बनाती है जो वो माँ ही तो है।
आँखें जब भी नम हुई जब भी गम ने तंग किया,
मेरे अश्कों को मोती बनाती है जो वो माँ ही तो है।
लडखडाया जब कभी भी देखकर दुनिया को मैं,
हाथ थामे साथ चलती है जो वो माँ ही तो है।
रौशनी संग संग रहे हर राह में बस इसलिए,
लम्हा लम्हा ख़ुद को जलाती है जो वो माँ ही तो है।
भूख सहकर जो लहू को कर रही थी दूध सा,
मेरे लिए ख़ुद को मिटाती जो रही माँ ही तो है.
Sunday, October 5, 2008
रात दिन में ढल रहा हूँ

भागता हूँ अपने माज़ी से मैं,या गफलत में हूँ,
क्यूँ मैं अपने दिल को ऐसे,अपने दिल से छल रहा हूँ।
क्यूँ मेरी ये जिंदगी अब,न रही जो पहले थी,
क्यूँ नहीं जी पाऊ वैसे,जीता जैसे कल रहा हूँ।
जब मैं तेरे पास था तब,थी चमक मुझ में सनम,
जब से तुझसे दूर हूँ,बे-नूर मैं हर पल रहा हूँ।
हर पल जिया हर दम मरा,हर लम्हा तेरी याद में,
हुई ना थी जब ये मोहब्बत,यूँ ना मैं बेकल रहा हूँ।
Saturday, October 4, 2008
हाल

शाख से टूटा हुआ ख़ुद से कुछ रूठा हुआ,
मैं नज़र का ख्वाब हूँ इक,हूँ मगर टूटा हुआ।
देखते हैं लोग मुझको देख कर अनजान हैं,
मैं मुसाफिर ही हूँ लोगो वक्त से छूटा हुआ।
मेरी किस्मत की तरह अब चैन-ए-दिल रूठा हुआ।
मेरे हिस्से वो ही आया हर गुमान झूठा हुआ।
Friday, October 3, 2008
दर्द

हर ख्वाब मेरा अब आँखों में रह रह के टूटा करता है,
दर्द मेरे दिल का मेरा सुख चैन भी लूटा करता है।
शोख अदा गुस्ताख नज़र अब तकदीर नहीं मेरी लोगो,
इस दिल में अब ज़ख्मो के अलावा इश्क भी फूटा करता है।
ढूंढ़ता हूँ मैं अब दर वो जो मुझको सहारा दे पाये,
अब मेरे हाथों से उनका वो दामन छूटा करता है।
है उसको पता मैं जीता हूँ बस उसकी मोहब्बत की खातिर,
फिर यार मेरा क्यूँ यु मुझसे रह रह के रूठा करता है।
ना चैन-ओ-सुकून है अब दिल में ना जीना है मकसद इसका,
जो यू दूर रहूँगा मैं तुझसे फिर जहाँ ये झूठा लगता है।
Wednesday, September 17, 2008
मुन्तजिर ...

मुन्तजिर हू मैं शराब-ए-इश्क का साकी मेरे,
नज़र से ऐसी पिला दे होश में न मैं रहू.
बुत है कहता कोई तुझको कोई कहता है खुदा,
मेरे दिल का तू खुदा है तुझे जिंदगी क्यूँ ना कहू।
आजा मेरे रू-ब-रू तेरी दीद पे मर जाऊ मैं,
जो ना देखू तुझको मैं फिर जीता यू कैसे रहू।
कह रहा है हर फ़साना राख से उठता धुंआ,
कब तलक इस इश्क से मैं इस कदर जलता रहू।
सजदे करता हूँ खुदा के काश लाये रंग वो,
हर दुआ में पास तू हो मांगता बस ये रहू।
रंग-ओ-बू गुलशन से चलके तेरे रुख तक आए हैं,
है तमन्ना मेरी तेरी जुल्फों में सोता रहू।
क़ैद कर ले मुझको अपने दिल में तू मेरे सनम,
कब तलक में इस जहान में यू भटकता ही रहू.
Tuesday, September 9, 2008
राख हू या गर्त हू ...
राख़ हू या गर्त हू अब ना पता है ये मुझे,
उसके क़दमो पे जो आऊ तो मुझे एहसास हो.
दिल में मेरे है बसा वो फरक अब कुछ है नही,
वो रहे फिर दूर दिल से ये मेरे वो पास हो.
रक्स-ए-गम की एक महफिल हम सजा तो ले सनम,
पर इश्क तेरा दिल में लेके कैसे ये अंदाज़ हो.
शब् में है तेरा ही जादू सहर में तेरी अदा,
क्यूँ मुझे फिर अपने दिन-ओ-रात पे ना नाज़ हो.
Wednesday, September 3, 2008
बे-इरादा नज़र...
बे-इरादा नज़र मेरी उनसे जब टकराई थी,
उफ़ क्या थी वो इक क़यामत मेरे दिल पे आई थी,
वो चलें तो सुबह चलती पलकों पे झुकती है शाम,
उनके नूर-ए-हुस्न से ये चांदनी शरमाई थी.
खूशबू चमन ने भी उनकी साँस से ही पाई थी.
ये ज़मीन उनकी अदा से डोलती है दीवानों सी,
उनकी आँचल की पनाहों से बहारें आई थी.
उनके रुख की दीद को ही नज़र फिर लहराई थी.
ये वजूद-ए-दिल में मेरे क्या कसक है छा गई,
ये मोहब्बत उनकी थी या उनकी ये अंगड़ाई थी.
मेरी ग़ज़ल के साथ उनके दिल की वो शेहनाई थी.
Sunday, August 31, 2008
इश्क...
तेरे होंठो की ये जुम्बिश कातिलाना है बड़ी,
जो नज़र उठ जाए तेरी जाम हर रंगीन हो.
अब मुझे मंज़ूर है तोहमत अगर दो इश्क की,
मौत भी मंज़ूर है गर ये खता संगीन हो.
कैसे फिर मेरी बाम-ओ-शब् उनके बिना हसीन हो.
माफ़ कर दे ए खुदा मैं कर न पाऊ सजदा तेरा,
तुझसे बेहतर तो मुझे दीदार-ए- माह्जबीन हो.
Friday, August 29, 2008
मोहताज...
मेरे हर्फ की जागीर तेरे नाम की मोहताज है,
कुछ कमी बिन तेरे है जो फिर छलकती आज है.
रूह का हासिल तसव्वुर इक तेरा ही है सनम,
बात कुछ है दिल मैं मेरे अब तलक जो राज है.
है बड़ी नासाज तबियत जो न रूबरू तू आज है,
पंख सारे जल गए जैसे खो गयी परवाज है.
मेरी मजबूरी रही थी जान की दुश्मन मेरी,
बस तेरा ही साथ अब मेरे मर्ज़ का इलाज है.
तेरे बिन न राग है न ज़िन्दगी मेरी साज है,
तेरे बिन ख्वाहिश भी मेरी लगती अब बे-आवाज है.
है हुकूमत तेरी दिल पे ये मैं बयां कैसे करूँ,
अब तू ही मंजिल है मेरी और तू ही हमराज़ है.
Tuesday, August 26, 2008
गम-ए-मोहब्बत...
ये गुनाह उसका नहीं है ये कसूर-ए-जाम है.
मौत से ही अब जुडी है हर दुआ इसकी खुदा,
वजह शायद इसका उनसे इश्क वो नाकाम है.
हासिल-ए-गम-ए-मोहब्बत चंद साँसे ही रही,
कब्र मैं ही हो बसर अब ये तमन्ना आम है.
सबको मिलते चाँद-तारे देख मैं हैरान हु,
मेरे हिस्से है अँधेरा वो भी कुछ बदनाम है.
बेवफाई की ये तोहमत उनको देकर क्या करें,
दिल को तो पहले पता था जो अब मेरा अंजाम है.
उनकी नजरो मैं मिली न गर पनाहें गम नहीं,
अब जनाज़े पे हू निकला कुछ यहाँ आराम है.
Sunday, August 24, 2008
दुश्मन...
दुश्मनों ने तो हैं बख्शी साँसे जीने के लिए.
रूबरू अब तुम नही हो अब नशा बाकी नही,
जाम साकी ने दिया क्यूँ फिर ये पीने के लिए.
अब नही रुसवाई तेरे नाम पे मंज़ूर है,
और भी गम हैं जहाँ मैं मेरे जीने के लिए.
डूबता न ऐसे मैं बीच दरिया मैं खुदा,
तू जो होता नाखुदा मेरे सफीने के लिए.
Tuesday, August 12, 2008
ख्वाब इक अनजान था...
जाम हाथो मैं रहा और लब पे उनका नाम था.
आहटें भी हो रही थी जाने क्यूँ वो रात भर,
साया उनका न दिखा मेरा इश्क फिर नाकाम था.
हसरतों की एक मंज़िल का हमें अरमान था,
ख़ुद वजूद-ए-दिल मेरा इस बात से हैरान था,
जिसकी चाहत थी इसे वो आ सका न पास में,
और इसको चाहा जिस ने शख्स वो बदनाम था.
महफिल-ए-गैरां मैं मेरे दिल का ये अंजाम था,
सब समझ अब ये गए थे इश्क वो नाकाम था,
दश्त-ऐ-कातिल हाथ मैं जब मौत लाया था यहाँ,
सब ने देखा मेरी नज़र मैं तब ख्वाब इक अनजान था.
[महफिल-ए-गैरां = अंजानो की महफिल]
[दश्त-ए-कातिल = कातिल के हाथ/हंड्स ऑफ़ थे किलर]
Sunday, August 10, 2008
Ishq tha....
Aankho main shokhi gazab ki bato main ikrar tha,
Chahe manzil meri chhooti par chalo achha hua,
Wo gumaan bhi mit gaya ki dil mera gulzaar tha.
Har saans meri saans main unke waado ka izhar tha,
Kya pata wo sach tha koi ya jhuth wo ikrar tha,
Kuchh pashemaan hum bhi hoke raat bhar roya kiye,
Kuchh pashemaan aankh unki jismain na koi pyar tha.
Mushk khilte khushbu aati kya haseen baagan tha,
Mere dil ki dhadkano main uska hi paigaam tha,
Shakhs jo mujhse mila tha jo meri pehchaan tha,
Kho gaya is bheed main wo main bhi ab gumnaam tha.
[Pashemaan = Shame/Sharminda]
[Gulzaar = Garden/Baag]
[Mushk = Flowers/Phool]
Saturday, August 9, 2008
ज़रा सोचो ...

जब पाप बढ़ा जब धर्म लुटा जब भूमि पर संहार हुआ,
तब तब नानक गौतम का,और राघव का अवतार हुआ.
वो दौर भी था जब कान्हा ने बंसी से प्रेम लुटाया था,
पर जब पाप किए थे कंस ने तब अस्त्रों से संहार हुआ.
जब जब अँधियारा छाया जब जब रुख पलटा हवाओ ने,
तब तब दीपक की ज्योति सा मानव ने प्रतिकार किया.
आकाश भी रोता है अब तो गहरे हैं ज़ख्म ये धरती के,
तुम ही क्यूँ अब तक सोये हो जिसका इन पर विस्तार हुआ.
अब तो जागो हुंकार भरो और कह दो उन तूफानों से,
जब जब उठते हैं हम तब तब हर साहिल का उद्धार हुआ.
है राज तो पर अब राम नही नीति भी अब साबुत न रही,
क्यूँ अर्थ के पीछे धर्म का यू हम लोगो से अपकार हुआ.
है लोग वो कुछ जो दुश्मन है मानव और मानवता के,
क्यूँ धारा-पुत्र अपने ही प्रति ख़ुद इस हद तक बेजार हुआ.
Thursday, August 7, 2008
Wednesday, August 6, 2008
Do Sitare...
Haar se bikhra ek main tha shay main doobe ek wo.
Yu na dil behlaiye....
Hai pata tum aaoge milne mujhe meri kabra par.
Main bhi chahu to baras lu ashq kaafi hain abhi,
Par sitam mera ye hoga aasmaan ke abra par.
Zindgi
Lag raha hai jaise iske dil main bhi kuchh raaz hai,
Ye bhi unse chot khake lagti hai bikhri hui,
Na falak ab koi iska na zinda koi parwaaz hai.
Waqt humko na mila itna bhi ki hum ro saken,
Aaj humse zarra zarra lagta kuchh naaraz hai.
Mere dil ki har jirah kaise yu be-parda hui,
Koi aur hai na wo bewafa mera koi humraaz hai.
Zulf ke saaye main shikwa zulm ka kaise karen,
Hai yahan kuchh kayda jo ishq ka andaz hai,
Door har manzil hai meri raasta mushkil bhi hai,
Koi na sathi raha dhadkan bhi ab be-aawaz hai.
Kabhi Tere...
Tamanna rakhte jo dilbar teri neende churane ki,
Na milne roz hum aate khwabo main kabhi tere...
Sawar sakte jo khud hi hum to phir gum hi humen kya tha,
Bhula ke tujhko ro lete khayalo main kabhi tere.
Guman humko na tha itna rahenge na kabhi tere.
Nasheman mera veeran hai afsana rota rehta hai,
Wo pal ab bhi satate hain guzare sang kabhi tere.
Humen bas yaad aate hain haseen waade tabhi tere.
Majburiyo ka gam kabhi puchho jo sahil se,
Kahani hai wahi wo bhi bahane jo the kabhi tere.
Meri har rag main behte hain haseen alfaz wo tere.
Agar gairat hai jo tujhmain to aaja rubaru ik baar,
Warna hum reh na payenge zamane main kabhi tere.
Ba-khuda
Ishq hota gar zindgi se to ishq na karte kabhi,
Hota gar aasan itna bin tere jeena yahan,
Armaan mere dil ke saare yu na phir marte kabhi.
Friday, August 1, 2008
...Kiski thi
Gum hai humko bewafa ka naam us dil ne diya,
Ba-hifazat ba-nazakat mezbani jiski ki.
Gar raha nasoor aisa ta-umar is bazm main,
Maut bhi aaye na kyun ab meharbani kiski thi.
Hum hi the naadan to phir ye aghalat kiski thi.
Bedum rahe humdum rahe par na kiya ruswa unhen,
Jo shikayat aansuo ne ki wo shikayat kiski thi.
Milta gar marham tumhara phir zarurat kiski thi.
Yu to maksad khas na tha jeene ka par kya pata,
Saanso ko aisi hararat har ghadi phir kiski thi.
Humne ki fariyad thi ye wo khilafat kiski thi.
Unse yu to har tamanna kehti rahi meri nazar,
Unke rukh pe the jo parde wo shararat kiski thi.
Sath Hongi...
Humare baad humari sirf yaaden sath hongi,
Tanhai main pukaroge to baaten sath hongi,
Umra kam di hai khuda ne meri lakeero main dost,
Marne ke baad bas teri nigahen mere sath hongi.
Nazar
Guzarta ja raha hu main is ada se waqt ke sath,
Na karar ki fikar rahi ab na ishq ke malal rahe,
Mana sirf bewafai hi mili humko unki aankho se magar,
Jitne bhi asar unki nazar main the sab kamal rahe.
Waqt yu zaya na kar...
Mehfilo main talash karke mujhe waqt yu zaaya na kar.
Gar bichhadna hi hai tujhko mujhse milne ke baad to,
Do ghadi ke liye mujhse milne yu aaya na kar.
Main to khud ki mar raha hu teri yaado main sanam,
Milne aayega tu mujhse ab ye kasam khaya na kar.
Main bhala hu gum ki dhoop main aur kuchh na chahiye,
Aadat bigad jayegi meri tu mujhpe yu saya na kar,
Muddato ke baad jiya hu tujhse bichhadne ke baad main,
Yu kareeb aake ek pal ke liye mujh pe sitam dhaya na kar.
Main to hu ek sehra jismain dhundh hai aur gart hai,
Mujhse milne yaar aise tu yahan aaya na kar,
Har pehar har shaam-o-sehar main dhundhta hu ab khushi,
aye gum mujheko bakhsh de ab mere dar aaya na kar.
Main sukun se hu yahan is banzar zameen-e-ishq pe,
Gum ka baadal aye sanam tu banke ab chhaya na kar.
Main jiyu ab saath tere ya fanna ho jaau main,
Mere saamne ye sawal tu aake yu laya na kar.
...Meri nahi
Jab nahi tha saamne tu hosh kuchh to tha mujhe,
Ab agar behosh hu main ye khata meri nahi.
Ik baar teri deed ki chahat yahan meri nahi.
Hum pashemaan hoke roye the jo tere rubaru,
Ye na ab kehna ki tumne nazar tab pheri nahi.
Gum ko humne tha bhulaya ek tere aasre,
Tujhse bichhad ke jeene ki ab aarzu meri nahi.
Chand lamho ka safar hai naam jiska hai zindgi,
Ab shab-e-dil ka basar baam main teri nahi.
Main chala jaunga mujhse sirf ye kehde sanam,
Tujhko jeene ke liye bhi ab garaz meri nahi.
Intezar-e-ishq
Dard-e-dil reh reh sataye intezar-e-ishq main,
Ab akele raha na jaye intezar-e-ishq main,
Ab nahi mumkin ki yu hi marte rehna dum-ba-dum,
Ab nahi mumkin ye jina intezar-e-ishq main.
Hum to jeene ka salika seekhte hain maut se,
Ab raha na jaye anpadh intezar-e-ishq main,
Wo hi manzar wo hi chehra ghumta hai aankh main,
Kyun bhula paaye na unko intezar-e-ishq main.
Rehguzar se yu guzaarti sansanati ye hawa,
Khushbu lati hai unhi ki intezar-e-ishq main,
Waqt ki pabandi main rote the hum zaar zaar,
Ashk bhi ruthe se hain ab intezar-e-ishq main.
Kyun shararat phir hai sujhi unko mere waste,
Kyun nahi samjhe wo tadpan intezar-e-ishq main,
Kuchh bahane kuchh fasane kuchh kahi ansuni zuban,
Kaise karen izhar unse intezar-e-ishq main.


