तेरे होंठो की ये जुम्बिश कातिलाना है बड़ी,
जो नज़र उठ जाए तेरी जाम हर रंगीन हो.
अब मुझे मंज़ूर है तोहमत अगर दो इश्क की,
मौत भी मंज़ूर है गर ये खता संगीन हो.
कैसे फिर मेरी बाम-ओ-शब् उनके बिना हसीन हो.
माफ़ कर दे ए खुदा मैं कर न पाऊ सजदा तेरा,
तुझसे बेहतर तो मुझे दीदार-ए- माह्जबीन हो.
ab kya kahen guru...
ReplyDeleteGAZAB !!
अब मुझे मंज़ूर है तोहमत अगर दो इश्क की,
मौत भी मंज़ूर है गर ये खता संगीन हो.
kaatil hai dost !!
Nice lines....padke dil-se-ye sabd nikale to socha type kar du... :)
ReplyDeletekhuda ki ibaadat kabul hai tujhe jabse tune uske fhun ko pehchana hai...
mehzabi usi ki phazal-o-karam se hai jiska tu diwana hai...