आज फिर इश्क के, मैं गम सजाए बैठा हूँ,
रु-ब-रु तूफां के, समंदर से निभाए बैठा हूँ.
उनका दीदार तो, यारो, कभी होता ही नहीं,
उनकी तस्वीर से अब, दिल लगाए बैठा हूँ.
वो बसर कैसे करें, लम्हात, स्याह रातों के,
रौशनी मिलती रहे, मैं दिल जलाए बैठा हूँ.
क्यूँ मुझे कहते हैं, इश्क का काफिर अदम,
हश्र क्या अपना मैं, सब को दिखाए बैठा हूँ.
ख़ुशी ही फक्त नहीं होती, प्यार का हासिल,
उसूल सारे ही मैं, दिल को सिखाए बैठा हूँ.
रूठता साकी है मुझसे, जो मैं देखूं मय को,
मैं इसलिए बज़्म में, नज़रें झुकाए बैठा हूँ.
न फिक्र जाम की, न खौफ मय का है मुझे,
निगाह-ए-यार से मैं, कब से चढ़ाए बैठा हूँ.
कहानी वस्ल की, और क्या, हिज्र की बातें,
'आदि' मैं यादों में, सब कुछ भुलाए बैठा हूँ.