बे-इरादा नज़र मेरी उनसे जब टकराई थी,
उफ़ क्या थी वो इक क़यामत मेरे दिल पे आई थी,
वो चलें तो सुबह चलती पलकों पे झुकती है शाम,
उनके नूर-ए-हुस्न से ये चांदनी शरमाई थी.
खूशबू चमन ने भी उनकी साँस से ही पाई थी.
ये ज़मीन उनकी अदा से डोलती है दीवानों सी,
उनकी आँचल की पनाहों से बहारें आई थी.
उनके रुख की दीद को ही नज़र फिर लहराई थी.
ये वजूद-ए-दिल में मेरे क्या कसक है छा गई,
ये मोहब्बत उनकी थी या उनकी ये अंगड़ाई थी.
मेरी ग़ज़ल के साथ उनके दिल की वो शेहनाई थी.
Acchi hai..
ReplyDeleteWell done...
First 2 lines are the best...
बहुत बढिया लिखा है।
ReplyDeleteबहुत खूब लिखा है आप ने ..बधाई ....
ReplyDeletebahut khoobsurat andaaj hai
ReplyDeleteadi kya thoughts hai
ReplyDeleteRocking.
Keep it up.
Ur DOst.V_V