रात भर जागा किए हम बस यही इक काम था,
जाम हाथो मैं रहा और लब पे उनका नाम था.
आहटें भी हो रही थी जाने क्यूँ वो रात भर,
साया उनका न दिखा मेरा इश्क फिर नाकाम था.
हसरतों की एक मंज़िल का हमें अरमान था,
ख़ुद वजूद-ए-दिल मेरा इस बात से हैरान था,
जिसकी चाहत थी इसे वो आ सका न पास में,
और इसको चाहा जिस ने शख्स वो बदनाम था.
महफिल-ए-गैरां मैं मेरे दिल का ये अंजाम था,
सब समझ अब ये गए थे इश्क वो नाकाम था,
दश्त-ऐ-कातिल हाथ मैं जब मौत लाया था यहाँ,
सब ने देखा मेरी नज़र मैं तब ख्वाब इक अनजान था.
[महफिल-ए-गैरां = अंजानो की महफिल]
[दश्त-ए-कातिल = कातिल के हाथ/हंड्स ऑफ़ थे किलर]
I cannot understand your poem becouse I know Turkısh and Englısh. But I wonder them. Can you wrıte Englısh? :)
ReplyDeleteBahut achhi kavita hai Aditya
ReplyDeleteBahut khoob istemaal ka lavzo ka tumne...
Mast....kayal kar dia...