Wednesday, February 1, 2012

शायद ...

दिवानों में, शुमार हूँ शायद,
जिंदा हूँ पर, बीम़ार हूँ शायद.

तुझको नशा, पसन्द नहीं,
और मैं इक, खुमार हूँ शायद.

मस्जिद की इक, अजाँ है तू,
मैं वीरानों की, पुकार हूँ शायद.

क्यूँ खुद पे, इख्तियार नहीं,
मैं इश्क का, शिकार हूँ शायद.

महका हुआ, इक चमन है तू,
मैं गम का, बाज़ार हूँ शायद.

बज़्म को बांधती, ग़ज़ल है तू,
मोहताज मैं, अशार हूँ शायद.

मुक़म्मल सी, इक वफ़ा है तू,
टूटा हुआ मैं, ऐतबार हूँ शायद.

बहलाने आते हो, दिल 'आदि',
मैं खिलोनों का, दयार हूँ शायद.



[ Khumaar - Intoxication ]
[ Azaan - Call For Prayer ]
[ Ashaar - Couplet (Plural of Sher) ]
[ Dayaar - Residence ]

Friday, December 23, 2011

तुम.. हर दम मेरे साथ...

सीली सीली सी इस रात को, अपनी गर्मी से खुश्क करती यादें.. जिनमें हमेशा से, सिर्फ तुम ही तो रही हो. ये यादें.. जो कभी कुरेदने पे आती हैं, तो दर्द इस हद तक जाता है, कि आहें भी थक हार कर, रात के सन्नाटे को गले लगा लेती हैं. और मुझे छोड़ जाती हैं, उन लम्हों के आगोश में, जिनके पास नश्तर से सवाल हैं, जो ज़हन में यूँ पैवस्त होते हैं, जैसे माला की डोर में फूल. उसी माला के कुछ फूल.. अब तक संभाल कर रखे हैं मैंने, रुमाल, जिसपे तुमने कढाई की थी, और वो डायरी भी तो याद होगी तुम्हें, जिसपे कभी तुम अपना, और.. कभी मेरा नाम लिख दिया करती थी. उन्हीं शब्दों से होकर, आज भी एक रास्ता मुझे, छोड़ आता है एक दरवाज़े तक, जहाँ से गुज़रा हुआ कल, बाहें पसारे, मुझे फिर बुलाता है. फिर याद आती है वो गलियां, जहाँ से तुम गुज़रा करती थी, फिर याद आते हैं वो ठिकाने, जहाँ से मैं तुम्हें निहारा करता था. दिन गुज़रे.. लम्हें बरसों में बदल गए, आज न तुम हो.. और न ही मैं अब मैं रहा. पर.. जारी है वो सिलसिला, जो हस सांस के साथ मुझ में रवाँ है. कुछ यादें... टपकती रहती हैं, बारिश में गीली छतों की तरह, कुछ यादें... महकती रहती हैं, बाग़ में आई बहार की तरह. और उनके साथ तुम.. हर दम मेरे साथ.. एक एहसास बनकर, आज भी रहती हो.. और हमेशा रहोगी. 

Wednesday, November 9, 2011

मुझे बदनाम करे...


जो खुले ज़ुल्फ़ तेरी तो, सहर को शाम करे,

तेरी साँसों से ही गुल, ख़ुश्बू का इंतज़ाम करे.

बाद मुद्दत के हैं आई, ये, वस्ल की घड़ियाँ,
वक़्त से कह दो, खुद को, ज़रा ख़िराम करे.

तोहमतें इश्क की सारी, हैं अब कबूल हमें,
फैसला चाहे जो अब, हुस्न का निज़ाम करे.

हुई हैं रुस्वाइयां भी, अब मेरे जीने की वजह,
है यही आरज़ू ये दुनिया, मुझे बदनाम करे.

सारे मंज़र मुझे, कुदरत के, लगते हैं फ़ीके,
तेरे ही ख्वाब देखे, बस, नज़र ये काम करे.

शब-ए-ख़ामोश से, करता हूँ, तेरी ही बातें,
औ' तेरा ही ज़िक्र, दर'लम्हा, ये अय्याम करे.

नज़र वो जाम सी है 'आदि', खता तेरी नहीं,
कि, जिसे देख ले, बस चैन को नीलाम करे.

[ Sahar : Morning]
[ Wasl : Meeting ] [ Khiraam : Slow Pace ]
[Nizaam : Administrator ]
[ Manzar : Scenes ]
[ Shab-e-Khamosh : Silent Night ] [ Ayyam : Day ]


Friday, August 26, 2011

साजिश किया करे...

नाराज़, हुस्न हो तो क्या, काविश किया करे,
क़यामत है दिल खुद अगर, साजिश किया करे.

यारो हिसाब रखते हैं, उल्फत का नादाँ लोग,
बिस्मिल ही क्या जो ऐसी, पैमाइश किया करे.

है ये, अहवाल अगर जीने का, उनसे जुदाइयाँ,
तो दिल, दुआ में मौत की, ख्वाहिश किया करे.

हाथों में सबके, आज कल, पुर-ज़ोर है नमक,
ज़ख्मों की अदम, न कभी, नुमाइश किया करे.

उस आसमाँ का निगहबाँ, बस परवरदिगार है,
जिस आसमाँ में, चाँद ख़ुद, गर्दिश किया करे.

नश्तर है नज़र जिसकी, जुल्फें हैं इक कफस,
सिफारिश, रहम की कैसे, ताबिश किया करे.

सुर्खी-ए-दिल दिल से जाना, संवारो हुस्न को,
लगा गुल'ए'वफ़ा ज़ुल्फ़ में आराइश किया करे.

जो अश्क ही सुलगाएं, आग, सीने में 'आदि',
आतिश की खता क्या, क्या बारिश किया करे.



[ Kavish - Thought ]
[ Paimaaish - Measuring ]
[ Nigahbaan - Guard ][ Gardish - Bad times ]
[ Kafas - Cage/Prison] [ Tabish - Grief/Sorrow]
[ Aaraish - Decoration/ Beauty ]
[ Aaatish - Fire ]


Friday, August 19, 2011

मलाल नहीं करता ...


ख़ामोशियों का
मैं, कोई मलाल नहीं करता,
औ' वो भी कभी, इज़हार'ए'हाल नहीं करता.

आज़र्दा हो जायेगा वो, औ झुका लेगा नज़र,
इसलिए, उससे कभी मैं, सवाल नहीं करता

शीरीं'ए-हुस्न न हो जाये, आरिज़'ए-नमकीं,
बाद ख़्वाबों के, अश्क इस्तमाल नहीं करता.

उसके आते ही, महकने लगे हैं, फूल सभी,
उसके बिन चमन
, खुश्बू बहाल नहीं करता.

ज़ुल्फ़ शानों पे गिराकर, यूँ संवरना उसका,
मेरी बेचैनी का वो क्यूँ, ख़याल नहीं करता.

एक ये इश्क उसपे, उसकी ही आरज़ू वरना,
रोज़ तो मैं, तड़पने का, कमाल नहीं करता.

दौर'ए-फुर्सत में, बनाया है खुदा ने तुझको,
वो मिस्ल'ए-हुस्न यूँ, हर साल नहीं करता.

गज़ब सवाब दिए उसने, 'आदि' उल्फत के,
जान तो लेता है लेकिन, हलाल नहीं करता.




[ Aazarda : Uneasy ]
[ Sheereen-e-Husn : Sweetness of beauty]
[ Aariz-e-Namkeen : Salty Cheeks ]
[ Shaanon pe : On Shoulders ]
[ Misl : Example ]
[ Sawaab : Reward ]

Thursday, July 14, 2011

समंदर नहीं हैं हम ...



माना तेरी निगाह का, मंज़र नहीं हैं हम,

गम ही मकाँ सही पर, बेघर नहीं हैं हम.

तेरे इकरार पे खिले थे, मुश्क-ए-आरज़ू,
इनको रोक पाते कैसे, बंजर नहीं हैं हम.

थोड़ी रौशनी पाके, हम भी संवर जायेंगे,
दयार-ए-वफ़ा हैं कि, खंडहर नहीं हैं हम.

साहिल बिखर गए हैं, सैलाब'ए-हिज्र में,
अदना सा दरिया हैं, समंदर नहीं हैं हम.

दिल्लगी छोड़ो, बताओ सूरत'ए-इकरार,
ग़ज़लें लिखें कब तक, शायर नहीं हैं हम.

इक तो जुदाई तेरी, उसपे यादें ये बेरहम,
यूँ फूटके, रोते वरना, अक्सर नहीं हैं हम.

आदि' संभाल लेते, शर्त'ए-शय'ओ-मात,
पर गुलाम-ए-वक़्त, सिकंदर नहीं हैं हम.




[ Manzar : Scene ] [ Maqaan : Residence ]
[ Iqraar : Declaration ] [ Mushq : Flower ]
[ Dayar : Residence ] [ Saahil : Shore ]
[ Sailaab : Flood ] [ Hijra : Separation ]
[ Surat-e-Iqraar : Condition for Declaration ]
[ Shart-e-Shay-o-Maat : Conditions of Victory and Defeat ]

Saturday, July 9, 2011

तुझको खुदा कर दूँ ...

दुआ-ए-इश्क मान ले, मैं तुझको खुदा कर दूँ,
हिस्सा'ए'जाँ बना, खुद को सबसे जुदा कर दूँ.

हम दोनों बनायेंगे, इक, तस्वीर-ए-मोहब्बत,
तू, रंग-ए-हुस्न भर दे, मैं रंग-ए-वफ़ा कर दूँ.

मुझे देखना चिलमन से, पर्दा, पतला लगाके,
करें इकरार निगाहें, मैं तेरा नाम हया कर दूँ.

दिल की धडकनों को, अता करदे अपना दिल,
बे-दिल दिखाऊं जीके, इक काम, नया कर दूँ.

जागीर मेरी होती, गर, दर-ज़र्रा ये क़ायनात,
मैं तेरे नाम इसे कर के, तुझ पे फ़िदा कर दूँ.

पुर-खुश्क सा समाँ है, उजड़ा सा है, गुलशन,
गर साथ दे तू मेरा, मैं बहार-ओ-सबा कर दूँ.

अपना वजूद वार के, आदि' बिस्मिल हुआ है,
यूँ नुकसान अपना करके, मैं तेरा नफा कर दूँ.




[ Iqarar - Declaration/Confession ]
[ Haya - Shyness ][ Saba - Kool Breeze ]
[ Bismil - Lover ][ Nafa - Profit ]

Saturday, July 2, 2011

जब ख़याल आया ...


फ़ना हुई हस्ती का, जब ख़याल आया,
और कुछ नहीं ज़रा सा, मलाल आया.

क्यूँ की पैरवी ग़मों की, अपने खिलाफ,
वक़्त-ए-रुख्सत, ज़हन में सवाल आया.

हँसते लब उन्हें कभी, पसंद नहीं आये,
औ' अश्कों का, हमें न इस्तमाल आया.

बेवफा नाम सही, याद तो किया उसने,
लबों पे उसके, ये ज़िक्र बहरहाल आया.

नाखुदा होके समंदर में, छोड़ दी कश्ती,
या खुदा रहम उसे, हमपे बेमिसाल आया.

ख़याल-ए-हिज्र से ही, सिहर जाता था,
आज वो रूबरू, करने को हलाल आया.

चाहकर भी जो मैं, रोक न सका खुदको,
वल्लाह हुस्न तेरा, तुझपे जमाल आया.

खिज़ा-ओ-वर्क है आदि, और वीराना है,
किस अदा से चमन में, नया साल आया.




[ Malaal - Grief ] [ Pairavi - Taking side of ]
[ Rukhsat - Dismissal | Zehan - Mind ]
[ BaharHaal - In Any case ] [ Nakhuda - Boatman ]
[ Hijra - Separation ] [ Jamaal - Beauty ]
[ Khiza - Autumn | Warq - Lightning ]

Friday, June 24, 2011

ईमाँ सा मिला वो ...


सर-ए-राह मिला उससे, पशेमाँ सा मिला वो,
कुछ मजबूरियों में जकड़ा, परेशाँ सा मिला वो.

इक कोना चाहिए था, जहाँ करता मैं ठिकाना,
औ'जब भी मिला मुझसे , आसमाँ सा मिला वो.

हर सांस का हाकिम, मेरी हस्ती का शाह था,
आज बज़्म में मिला तो, मेहमाँ सा मिला वो.

तक़दीर में नहीं है जो, मिलता उससे नहीं मैं,
पर बरसात की इक रात, अरमाँ सा मिला वो.

कभी हक़ से न हिला, हों चाहे लाख मुश्किलें,
क्यूँ बाद उम्र के इक उफ्फ, ईमाँ सा मिला वो.

नफरत नहीं कर सकता, जिससे चाह के बशर,
काविश में मुझसे कुछ, उर्दू ज़ुबां सा मिला वो.

सोचा था मय से मिलूँगा तो, ज़रा होश रहेगा,
दश्तों से मिला जब भी तो, पैमाँ सा मिला वो.

वो 'आदि' जो तेरे अक्स में, सोया था उम्र से,
सुना है आज जब मिला, तो बेजाँ सा मिला वो.





[ Pashemaan - Ashamed ]
[ Haq - Religion or Truth ]
[ Kaavish - Thought ]
[ May - Wine ] [ Dasht - Hands ]
[ Bejaan - Dead ]

Sunday, June 19, 2011

बेपरवाह न चलो ...


क़यामत सा हुस्न लेके, बेपरवाह न चलो,

नज़र से इश्क छू लो, कुचल चाह न चलो.

मफतून तुम्हारे शहर में, रहते हैं हजारों,
यूँ इतराके जान मेरी, सर-ए-राह न चलो.

मदहोश शब लगे है, और तारे भी नशे में,
तुम गुल ही रहो, छत पे बन माह न चलो.

कुछ तो वजूद बाकी अब, रहने दो खुदा का,
मस्जिद के सामने तुम, लिल्लाह न चलो.

मेरा दुनिया में ठिकाना, तुम्हारी नज़र है,
मुझसे छीनके तुम मेरी, ये पनाह न चलो.

तेरी दीद पे, सजता है, साँसों का ये चमन,
फुरक़त से, मेरी शब, करके स्याह न चलो.

ये लहजा मेरी ग़ज़ल का, तेरा ही अक्स है,
इसकी रूह बनो आदि', करते वाह न चलो.


[ Maftoon - Mad in Love ]
[ Gul - Flower | Maah - Moon ]
[ Lillah - For god sake ]
[ Panaah - Shelter ]
[ Furqat - Separation ]
[ Aks - Reflection ]

Friday, June 3, 2011

इन्तहां दिखाऊं तुझे ...

आ अपने शौक़ की मैं इन्तहां दिखाऊं तुझे,
तुझसे बावस्ता नज़र में जहां दिखाऊं तुझे.

चल मेरे साथ चमन में, गुलों से मिलवाऊं,
खुदाई मरती है तुझ पे, समां दिखाऊं तुझे.

इक बियाबाँ सा था जो आज हुआ है रौशन,
तेरा मिसाल'ए'करम वो मकां दिखाऊं तुझे.

नाम से तेरे मुझे अब याद करती है दुनिया,
साँसों के रास्ते आ, तेरे निशाँ दिखाऊं तुझे.

इक फज्ल आ मेरी बाहों को तू अता कर दे,
टूटना इश्क में, फिर मेरी जाँ, दिखाऊं तुझे.

लगा हूँ चूमने हर ज़र्रा मैं, सोचकर तुझको,
हर तरफ, तू ही है, कहाँ-कहाँ दिखाऊं तुझे.

बातें सब कहना लबों से, नामुमकिन आदि',
आहें महसूस कर, कैसे अरमाँ दिखाऊं तुझे.



| Shauq - Desire | Bawasta - Related to | Fazl - Reward or Kindness |
|Armaan - Desires |

Thursday, April 7, 2011

गम सजाए बैठा हूँ ...



आज फिर इश्क के, मैं गम सजाए बैठा हूँ,

रु-ब-रु तूफां के, समंदर से निभाए बैठा हूँ.

उनका दीदार तो, यारो, कभी होता ही नहीं,
उनकी तस्वीर से अब, दिल लगाए बैठा हूँ.

वो बसर कैसे करें, लम्हात, स्याह रातों के,
रौशनी मिलती रहे, मैं दिल जलाए बैठा हूँ.

क्यूँ मुझे कहते हैं, इश्क का काफिर अदम,
हश्र क्या अपना मैं, सब को दिखाए बैठा हूँ.

ख़ुशी ही फक्त नहीं होती, प्यार का हासिल,
उसूल सारे ही मैं, दिल को सिखाए बैठा हूँ.

रूठता साकी है मुझसे, जो मैं देखूं मय को,
मैं इसलिए बज़्म में, नज़रें झुकाए बैठा हूँ.

न फिक्र जाम की, न खौफ मय का है मुझे,
निगाह-ए-यार से मैं, कब से चढ़ाए बैठा हूँ.

कहानी वस्ल की, और क्या, हिज्र की बातें,
'आदि' मैं यादों में, सब कुछ भुलाए बैठा हूँ.

Wednesday, March 9, 2011

किताब में सोया वो गुलाब ...


किताब में सोया वो गुलाब,
एक दिन ऊंघते हुए,
आँख खोलकर,
किताब के पन्नों से बोला,
वो शख्स कहाँ है..
जिसने मुझे ये पनाह बख्शी थी.???
पन्ना उसकी तरफ देख के मुस्कुराया,
और अपने ऊपर जमी,
वक़्त की धूल हटाते हुए,
कुछ देखकर,
फिर मुस्कुरा दिया।

गुलाब ने पूछा क्या हुआ..?
तब वो यादों के तहखाने से,
कुछ लम्हे अपनी आगोश में,
समेट कर बोला:
वो सर्दियों के दिन हुआ करते थे,
मैं एक स्कूल के बस्ते में,
अपना वजूद समेटे,
उसके साथ चला करता था,
अचानक एक दिन उसने मुझे,
किन्ही नरम मरमरी हाथों में देते हुए कहा:
आराम से पढ़ लो,
फिर वापस कर देना.

ना जाने पढने वाले ने क्या पढ़ा,
उसकी नज़रों में या मेरे पन्नों में,
कि उसने मुझे,
तेरी खुश्बू-ओ-रंग से नवाज़ दिया.
और जब में वापस अपने बस्ते में पहुंचा...

तो गर्मियों के दिन शुरू हो चुके थे,
मैं वापस लाइब्रेरी में आ गया.
और वो पनाह देने वाला,
ज़माने में कहीं खो गया.

मैंने भी बहुत ढूंढा और उसने भी..
पर वो नहीं मिला॥

आज वो तो तन्हा सा होगा ही,
और अब तक तुम भी तन्हा थे,
पर यादों के आँगन में लाके,
आज तुमने मुझे भी तन्हा कर दिया.

Thursday, January 13, 2011

बिन तुम्हारे धड़कन भी, दिल की नहीं होती,
तुम्हारे बाद, जुस्तजू महफिल की नहीं होती।

ना जाने क्यूँ बावरी सी हो गई हैं, साँसे मेरी,
यूँ तो चाहत किसी को क़ातिल की नहीं होती।

अपने मामले दिल, ख़ुद तय करता है बशर,
इसको ज़रूरत, किसी आदिल की नहीं होती।

वो हमेशा लबों से, सुनना चाहते हैं अफ़साने,
पर हर बात बयाँ, दर्द-ए-दिल की नहीं होती।

राह-ए-इश्क में जो चला, जान हथेली पे लेके,
उसे फिर आरजू किसी मंजिल की नहीं होती।

सागर की लहरों में असर भले हो कातिलाना,
तुम गर साथ हो फिक्र साहिल की नहीं होती।

तमन्ना जीने की है, आज फिर, जागी 'आदि',
ऐसी मेहर, निगाह-ए-संगदिल की नहीं होती।

Thursday, December 23, 2010

मुझसे प्यार मत करना


मेरे गुलशन से, उम्मीद-ए-बहार मत करना,
मैं हूँ पुर-खार, तुम, मुझसे प्यार मत करना.

चेहरा कितना भी हँसीं हो, सितम कर देता है,
न दिल ये फ़िदा करना, नज़रें चार मत करना.

अपने वजूद को, अपने में समेटे रखना अदम,
इश्क में फंस के खुद को, मिस्मार मत करना.

उसे भी, मोहब्बत होगी, तो दे ही देगा जवाब,
उसके क़दमों पे रख ग़ैरत, इज़हार मत करना.

वो तो शौक़ रखते हैं, आशिकों को तड़पाने का,
इंतज़ार तो करना, खुद को बेक़रार मत करना.

संदली से उस बदन में, रहे है फूल जैसा दिल,
शिकवा करके उस हँसीं को, बेज़ार मत करना.

सहरा में रहना बेहतर, बजाय कुरबत-ए-हुस्न,
कभी राह-ए-हुस्न में आदि', दयार मत करना.



[ Pur-khaar - Full of Thorns ]
[ Mismaar - Destroyed ]
[ Gairat - Self Respect ]
[ Bezaar - Displeased ]
[ Sehra - Desert ]
[ Qurbat - Nearness ]
[ Dayaar - Residence ]

Tuesday, September 28, 2010

सबब इंतज़ार का...


कोई तो मुझको बताये, सबब अब इंतज़ार का,
मर्ज़ क्या है क्या दवा, अब दिल-ए-बीमार का.

जान रुख़सत हो रही है, क्यूँ मेरी हर साँस से,
हासिल-ए-चाहत है ये, या सितम है प्यार का.

जोड़कर ज़र्रों को हमने, इक नशेमन था किया,
उसको बिखरा देख, दिल ये, रो रहा बेजार का.

इस कब्र से बहती सदायें, कोई तो सुनले बशर,
मेरी हर इक आह है बस, फ़लसफा, इंकार का.

रोऊँ मैं या रोये तू ये हैं, नेमतें उल्फत की बस,
इस बात पे अब बता क्या, सबब है तकरार का.

बीते लम्हों से रहा ना, कोई शिकवा अब सनम,
कुछ नहीं है, वो महज़ हैं, सोज़ उस इकरार का.

क्यूँ ये तराना दूर से, आता हुआ, अपना सा है,
अब छेड़ता है कौन, 'आदि', साज़ मेरे प्यार का.





[ Sabab - Reason ]
[ Rukhsat - Leave/Dismissal ]
[ Nasheman - Nest ]
[ Bezaar - Displeased ]
[ Soz - Heat/Sorrow ]
[ Saaz - Instrument ]

Monday, September 20, 2010

ग़ज़ल लिख कर ...


ग़ज़ल लिख कर, अपने ग़म दबा लेता था,

ख़यालों की गली से, तुझको बुला लेता था.

कुछ ख्वाब बेचैन होकर, खरोचते थे नज़र,
संग अरमानों के, उनको मैं, सुला लेता था.

वक़्त के पास, यूँ तो न था, कुछ मेरे लिए,
लम्हात-ए-इश्क फिर भी मैं, चुरा लेता था.

कि वक़्त'ए क़ज़ा में, शोर मेरा दिल न करे,
लिहाज़ा, याद में यूँ दौड़ा के, थका लेता था.

अजीब मैं हूँ या अजीब है ये इश्क की रस्में,
जो सितम सहने को, सर मैं झुका लेता था.

गज़ब हुनर है ग़ज़ल में ये सभी की होती है,
वो हो लेते थे खुश औ' मैं ग़म सुना लेता था.

Monday, August 2, 2010

चेहरा नया समझे ...

बची हैं आरज़ू कितनी, उसे क्या ये क़ज़ा समझे,
जो आहट वक़्त ने की थी, उसे तेरी सदा समझे.

कभी जिसने सनम की, रूबरू ही दीद ना की हो,
शब का वो कहर समझे, ख़्वाबों का मज़ा समझे.

नहीं कुछ और गम मुझको, फक्त, एक ये गम है,
कभी तो, वो मुझे समझे, कभी मेरी वफ़ा समझे.

नशेमन पर मेरे चाहत, गिरी है वर्क इक बनकर,
पशेमाँ सोचते हैं, इश्क को हम, क्यूँ खुदा समझे.

वही गम फिर से आके, है बसा गोशा-ए-दिल में,
तुझे पाके जिसको हम, कभी खुद से जुदा समझे.

हम तो थे वही लेकिन, नहीं था हमने गम ओढ़ा,
हम में था, हुसूल-ए-इश्क, वो चेहरा नया समझे.

खुदा से माँगा 'आदि ने, इबादत में सनम तुमको,
दुआ में, नाम जो आया, उसको तुम खता समझे.


[ Gosha - Corner ]
[ Husool - Realisation ]

Wednesday, July 14, 2010

दीवार नहीं हम ...

तेरी ख्वाहिशों के दरमियाँ, दीवार नहीं हम,
पर ऐसा नहीं कि बिन तेरे, बेज़ार नहीं हम.

खुद से करें शिकवा, कि मिल सके न तुम,
या तेरी ही लकीरों का, इख़्तियार नहीं हम.

अग़र मिलने आ सको तो आना शिताब से,
कि रुख्सत के दौराँ करते इंतज़ार नहीं हम.

नशेमन पे आ गिरा मेरे शोला-ए-बर्क इक,
ज़ीनत के जहाँ में करेंगे, यूँ दयार नहीं हम.

इक बर्ग-ए-दरख़्त हैं हम जो टूटा शाख से,
नाता नहीं सबा से, औ' पुर-बहार नहीं हम.

बन जाते हम-क़दम, तेरे हर सफ़र में हम,
ख़िराम तुम न रह सके, बरफ़्तार नहीं हम.

'आदि' बेमेल राब्ता था जो अंजाम ये हुआ,
तुम क्यूँ हुए पशेमाँ जब, शर्मसार नहीं हम.


[ Bezar - Displeased ]
[ Ikhtiyaar - Right to ]
[ Shitaab - Quickly ]
[ Zeenat - Beauty ]
[ Dayaar - Residence ]
[ Barg-e-Darakht - Leaf of a Tree ]
[ Saba - Breeze ]
[ Pur-Bahaar - Abloom ]
[ Khiraam - Slow Paced ]
[ Raabta - Relationship ]
[ Pashemaan - Ashamed ]

Tuesday, July 13, 2010

आशिकों को काम क्या ...

इश्क के मैदाँ में, दूजा, आशिकों को काम क्या,
जंग अपने दिल से है आगाज़ क्या अंजाम क्या.

हुस्न की गलियों से गिले, आज फिर बहने लगे,
मयकशों को फर्क क्या, नाम क्या बदनाम क्या.

रुखसार की, इक दीद पर, दिल बिछा देते हैं वो,
सब फ़िदा तुमपे हुए, ख़ास क्या और आम क्या.

हर आरज़ू भी टूटती है, बिस्तर पे ले के करवटें,
फुरक़तों के दरमियाँ हो, चैन क्या, आराम क्या.

उनकी जुल्फें उनकी रंगत, है इस क़दर हावी हुई,
भूल बैठे हम अदम, है रात क्या, औ' बाम क्या.

हम झुका के नज़र जाना, हर सितम सह जायेंगे,
तौहीन जलवों की करे कमज़र्फ है ये गुलाम क्या.

जब देख लेते हैं तुम्हें तब, पैमाँ देती है ज़िन्दगी,
तुम जुदा होते हो, आती मौत है ये इंतज़ाम क्या.

'आदि' की ही है खता जो, मर मिटा है तुमपे ये,
नज़र तेरी तेरा जलवा, हम दें तुझे इल्ज़ाम क्या.


[ Aagaz - Beginning ]
[ Baam - Morning ]
[ Paimaan - Confirmation ]