बिन तुम्हारे धड़कन भी, दिल की नहीं होती,
तुम्हारे बाद, जुस्तजू महफिल की नहीं होती।
ना जाने क्यूँ बावरी सी हो गई हैं, साँसे मेरी,
यूँ तो चाहत किसी को क़ातिल की नहीं होती।
अपने मामले दिल, ख़ुद तय करता है बशर,
इसको ज़रूरत, किसी आदिल की नहीं होती।
वो हमेशा लबों से, सुनना चाहते हैं अफ़साने,
पर हर बात बयाँ, दर्द-ए-दिल की नहीं होती।
राह-ए-इश्क में जो चला, जान हथेली पे लेके,
उसे फिर आरजू किसी मंजिल की नहीं होती।
सागर की लहरों में असर भले हो कातिलाना,
तुम गर साथ हो फिक्र साहिल की नहीं होती।
तमन्ना जीने की है, आज फिर, जागी 'आदि',
ऐसी मेहर, निगाह-ए-संगदिल की नहीं होती।
तुम्हारे बाद, जुस्तजू महफिल की नहीं होती।
ना जाने क्यूँ बावरी सी हो गई हैं, साँसे मेरी,
यूँ तो चाहत किसी को क़ातिल की नहीं होती।
अपने मामले दिल, ख़ुद तय करता है बशर,
इसको ज़रूरत, किसी आदिल की नहीं होती।
वो हमेशा लबों से, सुनना चाहते हैं अफ़साने,
पर हर बात बयाँ, दर्द-ए-दिल की नहीं होती।
राह-ए-इश्क में जो चला, जान हथेली पे लेके,
उसे फिर आरजू किसी मंजिल की नहीं होती।
सागर की लहरों में असर भले हो कातिलाना,
तुम गर साथ हो फिक्र साहिल की नहीं होती।
तमन्ना जीने की है, आज फिर, जागी 'आदि',
ऐसी मेहर, निगाह-ए-संगदिल की नहीं होती।
behad achchi likhi hai.
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