जो खुले ज़ुल्फ़ तेरी तो, सहर को शाम करे,
तेरी साँसों से ही गुल, ख़ुश्बू का इंतज़ाम करे.
बाद मुद्दत के हैं आई, ये, वस्ल की घड़ियाँ,
वक़्त से कह दो, खुद को, ज़रा ख़िराम करे.
तोहमतें इश्क की सारी, हैं अब कबूल हमें,
फैसला चाहे जो अब, हुस्न का निज़ाम करे.
हुई हैं रुस्वाइयां भी, अब मेरे जीने की वजह,
है यही आरज़ू ये दुनिया, मुझे बदनाम करे.
सारे मंज़र मुझे, कुदरत के, लगते हैं फ़ीके,
तेरे ही ख्वाब देखे, बस, नज़र ये काम करे.
शब-ए-ख़ामोश से, करता हूँ, तेरी ही बातें,
औ' तेरा ही ज़िक्र, दर'लम्हा, ये अय्याम करे.
नज़र वो जाम सी है 'आदि', खता तेरी नहीं,
कि, जिसे देख ले, बस चैन को नीलाम करे.
[ Sahar : Morning]
[ Wasl : Meeting ] [ Khiraam : Slow Pace ]
[Nizaam : Administrator ]
[ Manzar : Scenes ]
[ Shab-e-Khamosh : Silent Night ] [ Ayyam : Day ]
वाह ..बहुत खूबसूरत गज़ल
ReplyDeleteआज 10 - 11 - 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....
ReplyDelete...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
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