
याद जब आई तेरी कलम ख़ुद लिखने लगी,
फिर सुरूर-ए-इश्क में बेखुदी बढ़ने लगी।
हुस्न कागज़ पे है उतरा क्या खता मेरी बता,
रफ़्तार पे जब कलम आई इसपे तू दिखने लगी।
मोल देके कौन सा तू अब खरीदेगा वफ़ा,
इश्क के शहरों में कबसे आरजू बिकने लगी।
सर्द नव्जों में थी सिहरन दूर था जब मुझसे तू,
तेरे एहसासों की गर्मी से साँस ये चलने लगी।
एक तेरी दीद से ये नूर उतरा है ज़ीस्त में,
शाम-ए-गम भी धीरे धीरे ए सनम ढलने लगी।
पहले नज़रें फिर मिला दिल फिर फ़साना बन गया,
हौले हौले फिर मोहब्बत परवान ये चढ़ने लगी।
थोड़ी हिम्मत आई है महफिल में जो देखा तुझे,
मुड़ के फिर जब देखा तूने ये ज़ुबाँ हिलने लगी।
तुझसे मिलके कुछ गुमाँ सा 'आदि' को ये हो गया,
जैसे गर्त-ए-ज़मीं उड़के फलक से मिलने लगी।
[zeest = Life]
[Gumaan = Thought/ Doubt]
वाह ! सुंदर अशआरों से सजी ग़ज़ल...
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