
पुराने दरख्तों के कुछ सूखे पत्ते गवाह हैं,
मैंने भुला दिया है तुझे जान ये अफवाह हैं।
कोई मेरे रूबरू आके तेरा नाम लेगा कैसे,
मेरी मोहब्बत की शिद्दत से सब आगाह हैं।
ज़माने की गुलामी हमें करनी नहीं आती,
मुफ़लिस ही सही मग़र दिल के बादशाह हैं।
मौत भी मंज़ूर है जो इश्क की हासिल मिले,
ये हश्र भी मंज़ूर है और सर इश्क के गुनाह हैं।
माफ़ करदे साक़ी मुझको मैं भुला बैठा तुझे,
हाथ में पर आज मेरे सिर्फ जाम-ए-निगाह हैं।
डर ना अब तूफाँ का है ना फिक्र मौजों की रही,
साथ बनके नाखुदा वो और वो ही हम-राह हैं।
हुस्न-ए-तलब देख ले बशर आज 'आदि' का,
बस तमन्ना उनकी दिल में ख्वाब बाकी स्याह हैं।
[Husn-e-talab' - Way of Wanting/Desiring]
[Syaah - Dark]
वाह ! बहुत खूब...सुंदर ग़ज़ल
ReplyDeleteBahut khoob aadi ji : )
ReplyDeleteaap k lafzo mai zinda hai wo har su...
jiski nazar-e-inaayat ki ki hai aarzoo...
khuda kare ho aapko har wo chaahat haasil...
yahi dua ye dost aapka maange harpal...
keep up the good wrk aadi ji :)
kya bat hai jnab...
ReplyDeletebahut khoob likha hai...
dilkash sher hai sabhi...