दौर-ए-खिज़ा हैं गुलशन में जाना कैसा,
इन टूटे ख्वाबों से रातों को सताना कैसा।
ज़िन्दगी तो यूँ तन्हा भी गुज़र जायेगी,
फिर इसे समझाना कैसा बहलाना कैसा।
मेरे आते ही जो मुंह फेर लिया है उसने,
उसकी साँसों पे फिर हक जताना कैसा।
उसकी फुरक़त में बेचैन हुआ है दिल ये,
खाम्खा झूठी ख़ुशी का फिर बहाना कैसा।
तोड़ के नाते सभी गैर की महफिल में है,
प्यार से रिश्ता फिर झूठा निभाना कैसा।
तुम कभी इश्क करो और तन्हा हो जाओ,
वो जब भुलाये तुम्हें लगता है बताना कैसा।
ग़म ये सारे मुझे हम-सफ़र से लगते हैं,
फिर 'आदि'...रोना कैसा मुस्कुराना कैसा।
Slaam bhai jaan !
ReplyDeletebhut khoob likha, har sher ko khoob tarasha ,shabd hi nhi hamare paas tareef ke liye. sari gazale bahut achchhi hai..
best of luck.