गम-ए-फुरक़त का यार इक सलाम लिए जा,
फहरिस्त-ए-दीवानों में एक और नाम लिए जा।
लुट गई आज फिर से जो तेरे नाम के साथ,
मेरी महफिल की फिर से इक शाम लिए जा।
गम-ए-दौराँ से किस बात पे तू डर रहा है दिल,
उनकी इबादत में उनका बस अब नाम लिए जा।
मिल जाएँ राह में तो उनसे कह देना बशर,
यहाँ कोई मर गया है उनपे ये पैगाम लिए जा।
बिना तेरे मुझे कैसे हो सुकून इस सेज पर,
आ तू मेरी कबर से सभी आराम लिए जा।
इश्क तुझसे करके जो हुई थी खता कभी,
मुस्कुरा के तू अपने भी इन्तक़ाम लिए जा।
बसर 'आदि' का मुनासिब है नहीं इस शहर में,
अब ख़ुश हूँ वीराने में ये सब इंतज़ाम लिए जा।
Bahut achha likhaa hai aaditya,
ReplyDeleteThoughts are amazing.
Was able to point out some small small mistakes though.
The words should be
जायें -- न कि जाएँ
कब्र -- न कि कबर
और 'है' शब्द को हटा सकते हो, आखिरी शेर में से
बसर 'आदि' का मुनासिब नहीं इस शहर में
bahut achha likha hai dost ...
ReplyDeletesaare sher bahut khoob bane hain...
aur feelings ke sath ...
bahut bahut achha ... mubarak ho..