
अरमानों को सहेज कर इक रोज़ हम चले,
ख़त में इश्क भेज कर इक रोज़ हम चले.
उनका मकान दूर था कुछ अपनी गली से,
फिर चाल अपनी तेज़ कर इक रोज़ हम चले.
यारो उनकी दीद की हमें जो आरजू रही,
उस मर्ज़ से परहेज़ कर इक रोज़ हम चले.
शय भी थी इक मात भी कुछ सूझा नहीं हमें,
उस इश्क से गुरेज़ कर इक रोज़ हम चले.
उम्र अपनी फ़ना करके ये दिल था रो रहा,
रगों को फिर नौ-खेज़ कर इक रोज़ हम चले.
भागते ना 'आदि' यूँ जो जीत सकते हम,
ज़ीस्त सजदा-रेज़ कर इक रोज़ हम चले.
[Gurez - Avoiding]
[Nau-khez - Youthful]
[Sajda ' rez - Bowed]
अच्छा लिखा है आदित्य
ReplyDeleteबस इसी तरह लिखते रहो
कुछ शेर तो गज़ब के थे,
सब से खास वो परहेज़ वाला लगा
अगर Technically पूछोगे, तो काफिया था एज न कि एज़
पर तुम्हारी गज़ल की खूबसूरती को देखते हुए, चलो जाने दो।
थोड़ी सी अगर उर्दू कम हो जाये, यानि के आम आदमी की भाषा में लिखी जाये, तो और मज़ा आ जाये।
जानता हूँ, के हिन्दी में काफिये नहीं मिलते, मगर क्या करूँ, जो दिल कहता है, वो मैं बोल ही देता हुँ, अब दिल को थोड़ी पता है के हिन्दी में काफिये कम होते हैं
खैर, मैं तो पागल हूँ मेरी बातों को दिल पे न लेना :)
खूबसूरत रचना आदित्य जी,
ReplyDeleteबहुत अच्छा लगा पढ़ कर,
बहुत अच्छी ग़ज़ल लिखते हैं आप.
जारी रखियेगा.
All the Best.
waah khoobsurat gazal kahte hain aap
ReplyDeleteshaandar gazal .
ReplyDeletebadhai
you simply rock budy.
ReplyDeletebadhiya likhte ho yaar aap to...
ReplyDeleteAwesome
bhut achi rehi ye ghazal
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