Tuesday, January 19, 2010

क्या कहिये ...


हुस्न क़यामत नज़र क़यामत अदा क़यामत क्या कहिये,
ये जलवे यूँ भी कम ना थे उस पे ये नजाकत क्या कहिये.

मैं काफ़िर था पर मुझको पुजारी बना गई उल्फत उनकी,
अब मुर्दा अरमाँ जीने लगे हैं उनकी इनायत क्या कहिये.

बस उनकी इक मुस्कान पे यारों वार दूँ अपनी हस्ती मैं,
अपनी ही जाँ से कर बैठा ये कैसी खिलाफत क्या कहिये.

नश्तर उनके दस्त में देखा फिर भी सर झुकता ही गया,
शिकवा हम तो कर न सकेंगे रस्म-ए-चाहत क्या कहिये.

ये अर्श के आँसूं दिखे बशर को नाम हँसीं शबनम बख्शा,
और अश्क मेरे मंज़ूर नहीं, क्यूँ आई हरारत क्या कहिये.

यूँ सामने आकर नज़र मिलाकर वो पल्लू दबाये दाँतों में,
दिल न सम्भले आरज़ू पिघले मेरी हिमाक़त क्या कहिये.

खिड़की पर आना ज़ुल्फ़ सुखाने चलके घुंघरूं वाले पैरों से,
तीर-नज़र के वार से नादाँ दिल की हिफाज़त क्या कहिये.

उनकी ही गली में जो रोज़ ही 'आदि' तकते हैं राहें उनकी,
वो इश्क के हमको हश्र बताएं उनकी हिमायत क्या कहिये.

Monday, January 18, 2010

कुछ ऐसा कमाल हो ...


काश इस बार की होली में कुछ ऐसा कमाल हो,
आसमाँ की सुर्खी का सबब प्यार औ' गुलाल हो.

बहुत बार सुने हैं मैंने ख़ुशी में मातम के नगमे,
चाहता हूँ साज़ पर इस दफा दीप-राग बहाल हो.

जज़्बा वो पैदा कर मेरे खुदा देश की आवाम में,
रहीम राम को पुकारे औ क़ाज़ी को न मलाल हो.

कुछ इस तरह से काँधे मिला दें आज अपनों से,
कि आँखों से अश्क बहें तो हाथ अपना रुमाल हो.

महज़ प्यार की ज़ुबान ही पढाई जाए मदरसों में,
और पर्चा-ए-तालीम में सिर्फ प्यार का सवाल हो.

रिश्तों के मसले मिटाना सीखें सभी मोहब्बत से,
भाई-भाई के बीच ए ख़ुदा ख़ंजर ना इस्तमाल हो.

कुछ ऐसे सजाओ अपने गुलशन-ए-हिंद को यारो,
जब भी अमन की बातें हों अपना हिंद मिसाल हो.

ख़ुदा के दर पे आज फिर 'आदि' है चलकर आया,
चढ़ते सूरज के संग मेरे हिंद का बुलंद इक़बाल हो.


[ Iqbaal - Fortune, Prosperity ]

Sunday, December 20, 2009

ज़माने वाले ...

मोहब्बत को मजाक़ समझते हैं ज़माने वाले,
फिर मुझे क्या खाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

मैं तो बस उल्फत की पैरवी में रहता हूँ यारों,
मेरे अंदाज़ को बेबाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

खुद में पैवस्त किया है उसको इश्क के चलते,
क्यूँ मुझे गिरेबाँ चाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

इन अदाओं से ही जीती बाज़ी-ए-इश्क उसने,
फिर क्यूँ उसे चालाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

हमें तो जीने की अदा सिखा गया इश्क उनका,
नादाँ हैं जो हमें हलाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

मेरी सांस को नव्ज़ों के खूँ को रवानी दी उसने,
तो क्यूँ उसे ख़तरनाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

उनके ही सजदे करते हैं फक्त इक दीद के लिए,
हमारी तरह उन्हें पाक़ समझते हैं ज़माने वाले.

कि उनकी रुसवाई के डर से दूर हुआ है 'आदि',
ज़ब्त-ए-गम-ए-फ़िराक़ समझते हैं ज़माने वाले.

Tuesday, December 8, 2009

बदलना सबको पड़ता है...

मुसीबत सब पे आती है, लड़ना सब को पड़ता है,
कदम थकते हैं सब ही के, चलना सब को पड़ता है.

हमेशा ही जीत हो हासिल, ज़रूरी ये नही होता,
कभी हार कर ख़ुद को, संभलना सब को पड़ता है.

बसर करती हैं गुलशन में, खिज़ाएँ भी बहारें भी,
हँसीं होता है गुल लेकिन, बिखरना सब को पड़ता है.

थोड़ा मैं संभल जाऊं, ज़रा तुम भी संभल जाओ,
जहाँ में दौर-ए-फुरक़त से, गुज़रना सबको पड़ता है.

कभी खुशियाँ मिलती हैं, कभी गम भी बरसते हैं,
ये दो साँचे हैं जीवन के, ढलना सब को पड़ता है.

ना खोना होश तू अपने, जो बिछड़े कोई भी अपना,
बिसात-ए-उल्फतें हैं ये, बहलना सब को पड़ता है.

ये अकेला मैं नहीं कहता, तुझे भी इल्म ये होगा,
गुज़रते वक्त के संग संग, बदलना सब को पड़ता है.

थपेड़े 'आदि' सहने हैं, जो कश्ती डाली दरिया में,
बहर-ए-ज़ीस्त गहरा है, निकलना सब को पड़ता है.




[ Bahar-e-Zeest - The Sea Of Life ]