मुसीबत सब पे आती है, लड़ना सब को पड़ता है,कदम थकते हैं सब ही के, चलना सब को पड़ता है.
हमेशा ही जीत हो हासिल, ज़रूरी ये नही होता,
कभी हार कर ख़ुद को, संभलना सब को पड़ता है.
बसर करती हैं गुलशन में, खिज़ाएँ भी बहारें भी,
हँसीं होता है गुल लेकिन, बिखरना सब को पड़ता है.
थोड़ा मैं संभल जाऊं, ज़रा तुम भी संभल जाओ,
जहाँ में दौर-ए-फुरक़त से, गुज़रना सबको पड़ता है.
कभी खुशियाँ मिलती हैं, कभी गम भी बरसते हैं,
ये दो साँचे हैं जीवन के, ढलना सब को पड़ता है.
ना खोना होश तू अपने, जो बिछड़े कोई भी अपना,
बिसात-ए-उल्फतें हैं ये, बहलना सब को पड़ता है.
ये अकेला मैं नहीं कहता, तुझे भी इल्म ये होगा,
गुज़रते वक्त के संग संग, बदलना सब को पड़ता है.
थपेड़े 'आदि' सहने हैं, जो कश्ती डाली दरिया में,
बहर-ए-ज़ीस्त गहरा है, निकलना सब को पड़ता है.
[ Bahar-e-Zeest - The Sea Of Life ]
kabhi khushiyan miltihai.kabhi gum barsate hain
ReplyDeleteye do sanche hain jeewan ke,dhalna sabko padta hai
wahhhh aditya kya bat kahi hai tumne..maja aa gaya pad ke