Saturday, August 22, 2009

कलम ख़ुद लिखने लगी ...


याद जब आई तेरी कलम ख़ुद लिखने लगी,
फिर सुरूर-ए-इश्क में बेखुदी बढ़ने लगी।

हुस्न कागज़ पे है उतरा क्या खता मेरी बता,
रफ़्तार पे जब कलम आई इसपे तू दिखने लगी।

मोल देके कौन सा तू अब खरीदेगा वफ़ा,
इश्क के शहरों में कबसे आरजू बिकने लगी।

सर्द नव्जों में थी सिहरन दूर था जब मुझसे तू,
तेरे एहसासों की गर्मी से साँस ये चलने लगी।

एक तेरी दीद से ये नूर उतरा है ज़ीस्त में,
शाम-ए-गम भी धीरे धीरे ए सनम ढलने लगी।

पहले नज़रें फिर मिला दिल फिर फ़साना बन गया,
हौले हौले फिर मोहब्बत परवान ये चढ़ने लगी।

थोड़ी हिम्मत आई है महफिल में जो देखा तुझे,
मुड़ के फिर जब देखा तूने ये ज़ुबाँ हिलने लगी।

तुझसे मिलके कुछ गुमाँ सा 'आदि' को ये हो गया,
जैसे गर्त-ए-ज़मीं उड़के फलक से मिलने लगी।




[zeest = Life]
[Gumaan = Thought/ Doubt]

Friday, August 21, 2009

तेरे बिना ...


तेरे बिना वक्त के हर करम नागवार गुज़रे,
सूखे सूखे से फिर ये मौसम-ए-बहार गुज़रे।

मेरी रूह को उल्फत ने सज़ा कुछ यूँ दी है,
तेरी यादों में मेरे सब ख्वाब बेज़ार गुज़रे।

जब तक अनजान था कुछ गुमाँ खुशी का था,
तड़प उठा मैं जब तेरे लबों से इन्कार गुज़रे।

दौलत-ए-इश्क बस दिल की बदौलत है मगर,
ज़माने से मिलके नज़रों से सौ बाज़ार गुज़रे।

तुझसे मिलने की तमन्ना में जिया मैं अब तक,
तेरी इक ना के बाद मौत से सौ इज़हार गुज़रे।

नहीं खींच पाता 'आदि' को कोई अपनी तरफ़,
हसीँ चेहरे यूँ तो इन नज़रों से कई बार गुज़रे।

Tuesday, August 18, 2009

कुछ सूखे पत्ते गवाह हैं ...


पुराने दरख्तों के कुछ सूखे पत्ते गवाह हैं,
मैंने भुला दिया है तुझे जान ये अफवाह हैं।

कोई मेरे रूबरू आके तेरा नाम लेगा कैसे,
मेरी मोहब्बत की शिद्दत से सब आगाह हैं।

ज़माने की गुलामी हमें करनी नहीं आती,
मुफ़लिस ही सही मग़र दिल के बादशाह हैं।

मौत भी मंज़ूर है जो इश्क की हासिल मिले,
ये हश्र भी मंज़ूर है और सर इश्क के गुनाह हैं।

माफ़ करदे साक़ी मुझको मैं भुला बैठा तुझे,
हाथ में पर आज मेरे सिर्फ जाम-ए-निगाह हैं।

डर ना अब तूफाँ का है ना फिक्र मौजों की रही,
साथ बनके नाखुदा वो और वो ही हम-राह हैं।

हुस्न-ए-तलब देख
ले बशर आज 'आदि' का,
बस तमन्ना उनकी दिल में ख्वाब बाकी स्याह हैं।



[
Husn-e-talab' - Way of Wanting/Desiring]
[Syaah - Dark]

Friday, August 14, 2009

वजह ...


हर घड़ी चलता हूँ मैं, साथ लेके प्यार को,
तन्हा तन्हा कैसे काटूँ, ज़िन्दगी दुश्वार को।

कभी करके मिन्नतें, कभी करके बंदगी,
धीरे धीरे बढ़ा रहा हूँ, इश्क के व्यापार को।

जब कभी वो आयेंगे, अपना कर लेंगे मुझे,
आस दिल में ये लिए,
रखता हूँ इंतज़ार को।

क़त्ल भी हो जाऊं मैं, जो इक इशारा वो करें,
इस बहाने देख लूँगा, उनकी नज़र की धार को।

चाँद कहते हैं उन्हें सब, मरने वाले हुस्न पे,
सब तड़पते हैं गली में, उनके इक दीदार को।

नाम उनका लेते लेते, हो रहा है ये फ़ना,
और कोई रट नहीं, मेरे दिल-ए-बीमार को।

नज़र तो कह ही गई है, जो है मंज़र इश्क का,
लब तलक आने में लगता है, वक्त हर इकरार को।

आईने से दुश्मनी, अपनी भी है इक उम्र से,
हमसे पहले हर सुबह वो, घूरता था यार को।