हर घड़ी चलता हूँ मैं, साथ लेके प्यार को,
तन्हा तन्हा कैसे काटूँ, ज़िन्दगी दुश्वार को।
कभी करके मिन्नतें, कभी करके बंदगी,
धीरे धीरे बढ़ा रहा हूँ, इश्क के व्यापार को।
जब कभी वो आयेंगे, अपना कर लेंगे मुझे,
आस दिल में ये लिए, रखता हूँ इंतज़ार को।
क़त्ल भी हो जाऊं मैं, जो इक इशारा वो करें,
इस बहाने देख लूँगा, उनकी नज़र की धार को।
चाँद कहते हैं उन्हें सब, मरने वाले हुस्न पे,
सब तड़पते हैं गली में, उनके इक दीदार को।
नाम उनका लेते लेते, हो रहा है ये फ़ना,
और कोई रट नहीं, मेरे दिल-ए-बीमार को।
नज़र तो कह ही गई है, जो है मंज़र इश्क का,
लब तलक आने में लगता है, वक्त हर इकरार को।
आईने से दुश्मनी, अपनी भी है इक उम्र से,
हमसे पहले हर सुबह वो, घूरता था यार को।

अंगड़ाई में शोखी गज़ब की, निगाहों में हिजाब है,
या खुदा ये मेरा सनम है, या की मेरा ख्वाब है।
सुरमई आँखें ये ज़ुल्फें, ढलती शानों पे चुनर ,
किस मुसव्विर ने रचा है, ये हुस्न तो नायाब है।
जो कमर में बल पड़ा, झुक गई कायनात ये,
बेतहाशा हुस्न पे वाह !, चांदनी सा आब है।
होंठों से एक बार पीके, अब तलक हैं सुरूर में,
क़ैद उनकी हर नज़र में, उल्फत का इक सैलाब है।
कत्ल करके मुस्कुराना, और झुकाना ये नज़र,
हर अदा मेरे खुदा उफ्फ, उन में बेहिसाब है।
दरमियाँ दूरी रहे न, ए सनम कुछ ऐसा कर,
तुझपे लुटने की तमन्ना में, साँस हर बेताब है।
मेरी तो शाम-ओ-सुबह तू , दुनिया भी तू ही सनम,
है फलक गर दिल मेरा तो, इसका तू माहताब है।
बड़ी रुस्वाइयां लेकर, चला था उस शहर से मैं,
खुदा ही जानता है ये, बचा कैसे कहर से मैं।
अँधेरा इश्क ने करके, उजाडा है चमन मेरा,
भला अब नूर की ख्वाहिश, करू कैसे मेहर से मैं।
बड़ी चाहत थी दुनिया को, जनाज़ा देख ले मेरा,
बड़ी ही सख्त जाँ निकला, मरा जो न ज़हर से मैं।
जहाँ तन्हाइयों का घर, मोहब्बत की तिजारत है,
मजारें हैं जहाँ दिल की, हूँ गुज़रा उस शहर से मैं।
बड़ी मुश्किल में कश्ती थी, शबाबों पे थी वो मौजे,
था रूठा नाखुदा फिर भी, बचा कैसे लहर से मैं।
सनम तेरी ही तरह सब, छुपाके बैठा है वो भी,
भला गौहर बता कैसे, चुरा लूँ इस बहर से मैं।
मेरे हाथो में जो भी था, मेरी किस्मत ने है लूटा,
फकीरों की है ये बस्ती, क्या मांगू इस दहर से मैं।[मेहर- सूरज]
[गौहर - मोती/रत्न]
[बहर- सागर/समुद्र]
[
दहर-
दुनिया]
जुदा करके सफीने से, ना ऐसे मुस्कुराओ अब,
बड़ी ज़ालिम हैं ये मौजें, ना ऐसे यार जाओ अब।
मेरे दिल से भले खेलो, मुझे ऐतराज़ ना होगा,
मगर मिल मिल के गैरों से, इसे यूँ ना जलाओ अब।
कभी कहते थे होगा वक्त तो, दोगे जवाब-ए-दिल,
वही फिर पूछता हूँ मैं, मुझे कुछ तो बताओ अब।
ज़रा आ जाओ बाहों में, तमन्ना की गुजारिश है,
कि ऐसे दूर रह रह कर, मुझे यूँ ना सताओ अब।
मेरी कुछ उलझनें ऐसी हैं कि, घबरा रहा हूँ मैं,
तुम हर राज़ से परदा, सनम आके उठाओ अब।
ना मुझको ये जहाँ देखे, जहाँ को मैं भी ना देखूं,
मुझे ऐसा ठिकाना दो, मुझे ऐसे छिपाओ अब।
[Safeena - Boat]